Thursday, July 4, 2013

जीवन में रफ्तार बहुत है

तुमसे मुझको प्यार बहुत है
बीच खड़ी दीवार बहुत है

भले मुझे तरजीह नहीं दो
मैं मानूँ अधिकार बहुत है

मिली नियति से जब सुन्दरता
क्यों करती श्रृंगार, बहुत है

आँखों से उतरा तो देखा
दिल तेरा बीमार बहुत है

आस पास और देखो नीचे
जीने को आधार बहुत है

झटपट मुझको तू अपना ले
जीवन मे रफ्तार बहुत है

सुमन के रंग में रंग जाओ तो
खुशियों का संसार बहुत है

10 comments:

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून said...

वाह सुमन जी बहुत उम्‍दा ग़ज़ल है

विभूति" said...

प्रभावित करती रचना .

गुड्डोदादी said...

आशीर्वाद
आँखों से उतरा तो देखा
दिल तेरा बीमार बहुत
बहुत ही सुंदर श्रृंगारिक रचना

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन नहीं रहे कंप्यूटर माउस के जनक डग एंजेलबर्ट - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

ANULATA RAJ NAIR said...

वाह...
बहुत बहुत सुन्दर....
बेहतरीन ग़ज़ल...

सादर
अनु

प्रवीण पाण्डेय said...

आप लिखें तो सब सुध पाते, शब्दों में आसार बहुत है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (06-07-2013) को <a href="http://charchamanch.blogspot.in/ चर्चा मंच <a href=" पर भी होगी!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kusum Thakur said...

वाह......शब्दों का अद्भुत संयोजन.

Anita Lalit (अनिता ललित ) said...

बहुत सुंदर ग़ज़ल...

~सादर!!!

कालीपद "प्रसाद" said...

बहुत प्रभावी रचना !
latest post मेरी माँ ने कहा !
latest post झुमझुम कर तू बरस जा बादल।।(बाल कविता )

हाल की कुछ रचनाओं को नीचे बॉक्स के लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं -
रचना में विस्तार
साहित्यिक  बाजार  में, अलग  अलग  हैं संत। जिनको  आता  कुछ  नहीं, बनते अभी महंत।। साहित्यिक   मैदान   म...
अन्ध-भक्ति है रोग
छुआछूत  से  कब  हुआ, देश अपन ये मुक्त?  जाति - भेद  पहले  बहुत, अब  VIP  युक्त।। धर्म  सदा  कर्तव्य  ह...
गन्दा फिर तालाब
क्या  लेखन  व्यापार  है, भला  रहे  क्यों चीख? रोग  छपासी  इस  कदर, गिरकर  माँगे  भीख।। झट  से  झु...
मगर बेचना मत खुद्दारी
यूँ तो सबको है दुश्वारी एक तरफ  मगर बेचना मत खुद्दारी एक तरफ  जाति - धरम में बाँट रहे जो लोगों को  वो करते सचमुच गद्दारी एक तरफ  अक्सर लो...
लेकिन बात कहाँ कम करते
मैं - मैं पहले अब हम करते  लेकिन बात कहाँ कम करते  गंगा - गंगा पहले अब तो  गंगा, यमुना, जमजम करते  विफल परीक्षा या दुर्घटना किसने देखा वो...
विश्व की महान कलाकृतियाँ- पुन: पधारें। नमस्कार!!!