Tuesday, October 22, 2013

शासक से ज्यादा कातिल में

कहाँ शिकायत मेरे दिल में
आस लिए बैठा महफिल में

कोशिश में कुछ भले कमी हो
खोट नहीं होती मंजिल में

जी लेगा मिहनत के दम पर
व्यर्थ ढूँढना है काहिल में

जीवन की गहराई कबतक
खोजोगे तुम बस साहिल में

दिल्ली से है मिली निराशा
दया नहीं होती बेदिल में

नीति-नियम है संविधान भी
नहीं ज्ञान देखा जाहिल में

सुमन रहम दिखलाई देती
शासक से ज्यादा कातिल में

4 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (23-10-2013)   "जन्म-ज़िन्दग़ी भर रहे, सबका अटल सुहाग" (चर्चा मंचःअंक-1407)   पर भी होगी!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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करवा चौथ की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

ई. प्रदीप कुमार साहनी said...

प्रभावशाली रचना |

Pratibha Verma said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति। ।

प्रवीण पाण्डेय said...

सही है, सच यही है।

हाल की कुछ रचनाओं को नीचे बॉक्स के लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं -
विश्व की महान कलाकृतियाँ- पुन: पधारें। नमस्कार!!!