Thursday, October 17, 2013

आती अब बारात नहीं

मन में झंझावात नहीं
 पर आपस में बात नहीं

भाव नहीं चेहरे पर दिखते
क्या दिल में जज्बात नहीं

मौसम हो बारिश का चाहे
आँखों में बरसात नहीं

जिम्मेवारी की उलझन में
आती वैसी रात नहीं

मनमाफिक हालात बना ले
ये सबकी औकात नहीं

आसानी से अक्सर कहते
वैसे अब हालात नहीं

सुमन हृदय में अपनापन ले
आती अब बारात नहीं

9 comments:

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

बेहतरीन,सुंदर गजल !

RECENT POST : - एक जबाब माँगा था.

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (19-10-2013) "शरदपूर्णिमा आ गयी" (चर्चा मंचःअंक-1403) पर भी होगी!
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kuldeep Thakur said...

सुंदर रचना के लिये ब्लौग प्रसारण की ओर से शुभकामनाएं...
आप की ये खूबसूरत रचना आने वाले शनीवार यानी 19/10/2013 को ब्लौग प्रसारण पर भी लिंक की गयी है...

सूचनार्थ।

Kuldeep Thakur said...

सुंदर रचना के लिये ब्लौग प्रसारण की ओर से शुभकामनाएं...
आप की ये खूबसूरत रचना आने वाले शनीवार यानी 19/10/2013 को ब्लौग प्रसारण पर भी लिंक की गयी है...

सूचनार्थ।

कालीपद प्रसाद said...

बहुत सुन्दर ग़ज़ल
नई पोस्ट महिषासुर बध (भाग तीन)
latest post महिषासुर बध (भाग २ )

ई. प्रदीप कुमार साहनी said...

बहुत बढ़िया ग़ज़ल |

मेरी नई रचना:- "झारखण्ड की सैर"

sunita agarwal said...

sundar rachna .. shubhkamnaye :)

Nitish Tiwary said...

bahut sundar gazal hai
mere blog par bhi aap sabhi ka swagat hai.
http://iwillrocknow.blogspot.in/

प्रवीण पाण्डेय said...

कह बहरों से गहरी बातें।

हाल की कुछ रचनाओं को नीचे बॉक्स के लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं -
विश्व की महान कलाकृतियाँ- पुन: पधारें। नमस्कार!!!