Tuesday, November 26, 2013

तब बलखाती अच्छाई

लोग  सम्भलते  बुरे  वक्त में, बढ़ती जाती अच्छाई
अच्छे  दिन की मदहोशी मे, किसे सुहाती अच्छाई

चक्र घूमता और जीवन में, सुख दुख आते जाते हैं
हर हालत में होश सलामत, यही सिखाती अच्छाई

बोझ  बनाकर जीवन जीते, अक्सर ऐसे लोग मिले
टकराते हालात से जब जब, तब मुस्काती अच्छाई

गलत  राह  पे  चलकर जीते, वही सराहे जाते क्यों
हाल  जहाँ  पर ऐसा दिल में, आग लगाती अच्छाई

बस चीजों से प्यार भला क्यूँ, इन्सानों से प्यार करो
भौतिकता  और  इन्सानों  में, फर्क बताती अच्छाई

पाठ  पढ़ा  हम  सब ने यारो, अन्त  बुराई का होता
अच्छाई  की  नहीं  है सीमा, सबको भाती अच्छाई

प्रेम - समर्पण इक दूजे पर, साथी ऐसा मिले सुमन 
भाव बढ़े करुणा के मन में, तब बलखाती अच्छाई

5 comments:

Yashwant R. B. Mathur said...

कल 28/11/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद!

डॉ. दिलबागसिंह विर्क said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 28-11-2013 को चर्चा मंच पर दिया गया है
कृपया पधारें
धन्यवाद

कालीपद "प्रसाद" said...

बहुत बढ़िया ग़ज़ल !
नई पोस्ट तुम

Kailash Sharma said...

बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति...

प्रवीण पाण्डेय said...

शब्द आपको मिले तो खुद ही,
पल पल गाती अच्छाई।

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विश्व की महान कलाकृतियाँ- पुन: पधारें। नमस्कार!!!