Saturday, June 28, 2014

आ कर लें हम तुम प्यार

है प्रेम सृजन संसार, आ कर लें हम तुम प्यार।
ना इन्सानी बाजार, आ कर लें हम तुम प्यार।।

रिश्ते जीवन की मजबूरी, फिर आपस में कैसी दूरी।
कुछ नोंक-झोंक और खटपट संग, मिलती रिश्तों को मंजूरी।
ये रिश्ते हैं आधार, आ कर लें हम तुम प्यार।।

हँसकर जीने की आदत हो, चाहे जैसी भी आफत हो।
इक दूजे से मिलकर रहना, जो आगे की भी ताकत हो।
ना खड़ी करो दीवार, आ कर लें हम तुम प्यार।।

नित जीने के दिन कम होते, जीते, जिसके दमखम होते।
कुछ मानवता के रिश्ते हैं, लेकिन सब के हमदम होते।
दिन करते क्यों बेकार, आ कर लें हम तुम प्यार।।

हम यहाँ रहें या वहाँ रहें, बिन इन्सानों के कहाँ रहें।
आपस में प्रेम परस्पर हो, कोमल यादों की निशाँ रहे।
कर सुमन को अंगीकार, आ कर लें हम तुम प्यार।।

2 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

बढ़िया ।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (30-06-2014) को "सबसे बड़ी गुत्थी है इंसानी दिमाग " (चर्चा मंच 1660) पर भी होगी।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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