Saturday, July 12, 2014

जनता फाँके धूल

बेटे की शादी हुई, हृदय जगा इक आस।
सास बहू बनती गयी, आज बहू ही सास।।

पुत्र बसा ससुराल में, हुआ बहुत अवसाद।
खुशी हुई जब आ बसा, अपने घर दामाद।।

नेता या अफसर बड़े, प्रश्न आज का मूल।
दोनों ही चालाक हैं, जनता फाँके धूल।।

घर बाहर दोनों जगह, देख अभी क्या हाल।
बाहर जो बेहाल हैं, घर में भी बेहाल।।

मिश्री मुँह में घोलकर, वचन सदा तू बोल।
धन दौलत बेकार है, व्यवहारों का मोल।।

जीवन जी भर जी सके, सबका है संसार।
सुमन सिसकते लोग का, छीनो मत अधिकार।।

2 comments:

kuldeep thakur said...

आप की ये खूबसूरत रचना...
दिनांक 14/07/2014 की नयी पुरानी हलचल पर लिंक की गयी है...
आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित हैं...आप के आगमन से हलचल की शोभा बढ़ेगी...
सादर...
कुलदीप ठाकुर...

काजल कुमार Kajal Kumar said...

वाह क्‍या बात है.

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विश्व की महान कलाकृतियाँ- पुन: पधारें। नमस्कार!!!