Monday, July 21, 2014

सहने लायक ही दूरी दे

रात मुझे इक सिन्दूरी दे
या मरने की मंजूरी दे

पागल होकर मर ना जाऊँ
सहने लायक ही दूरी दे

होते लोग हजारों घायल
खास नज़र की वो छूरी दे

खुशी बाँटना मत किश्तों में
खुशियाँ पूरी की पूरी दे

तुम संग जी ले सुमन खुशी से
ना जीने की मजबूरी दे

15 comments:

कालीपद प्रसाद said...

खुशी बाँटना मत किश्तों में
खुशियाँ पूरी की पूरी

बहुत उम्दा ग़ज़ल !
कर्मफल |
अनुभूति : वाह !क्या विचार है !

yashoda agrawal said...

आपकी लिखी रचना बुधवार 23 जुलाई 2014 को लिंक की जाएगी...............
http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

स्वाति said...

bahut khoob.........

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
--
आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (23-07-2014) को "सहने लायक ही दूरी दे" {चर्चामंच - 1683} पर भी होगी।
--
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Shalini Rastogi said...

bahut khoob!

मनोज कुमार said...

बहुत ख़ूब!

Asha Saxena said...


पागल होकर मर ना जाऊँ
सहने लायक ही दूरी दे

बहुत बढ़िया

sushma 'आहुति' said...

मन के भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने...

sushma 'आहुति' said...

मन के भावो को खुबसूरत शब्द दिए है अपने...

Rewa tibrewal said...

sundar prastuti

Smita Singh said...

बहुत खूब बेहतरीन

Anusha Mishra said...

बहुत बढ़िया

Anusha Mishra said...

बहुत बढ़िया

Pratibha Verma said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

VIRESH ARORA said...

बेहतरीन.....

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