Sunday, March 1, 2015

भाई अच्छा कौन?

अहंकार से मिट गए, नहीं बना जो हंस।
परिणति इनकी देख लो, रावण कौरव कंस।।

सीता थी विद्रोहिणी, तोड नियम उपहास।
राम संग सुख छोडकर, चली गयी वनवास।।

ऑखें पर अंधा हुए, फॅसा मोह में प्राण।
पुत्र-मोह धृतराष्ट्र का, इसका एक प्रमाण।।

कहीं विभीषण था मुखर, कुम्भकरण था मौन।
रावण की उलझन यही, भाई अच्छा कौन?

बेबस क्यों दरबार में, भीष्म द्रोण सम वीर।
कुछ न बोले हरण हुआ, द्रुपदसुता का चीर।।

गान्धारी को ऑख पर, देखी ना संसार।
पतिव्रता या मूर्खता, निश्चित करें विचार।।

दुर्दिन तो भाता नहीं, नेक बात, सन्देश।
दुर्योधन ने कब सुना, कान्हा का उपदेश।।

मूक नहीं सीता कभी, जब तब किया प्रहार।
साहस था तब तो गयी, लक्ष्मण-रेखा पार।।

लाख बुराई हो भले, रावण था विद्वान।
राम स्वतः करते रहे, दुश्मन का सम्मान।।

3 comments:

Kamal Upadhyay said...

बहुत ही शानदार
http://puraneebastee.blogspot.in/
@PuraneeBastee

कालीपद "प्रसाद" said...

बहुत सुन्दर रचना !
न्यू पोस्ट हिमालय ने शीश झुकाया है !
न्यू पोस्ट अनुभूति : लोरी !

harish yaduvanshi said...

नए कलेवर में रचा , दोहा का ये छंद

अंतर तक घायल करे , शब्दों का अनुबन्ध ।।

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