Friday, April 17, 2015

मचा हुआ कोहराम समन्दर

रस्ता मांगा राम समन्दर
नहीं दिया, बदनाम समन्दर
पास तुम्हारे हरदम देखा
मचा हुआ कोहराम समन्दर
सोच रहा क्या नहीं चाहिए
तुझे कभी आराम समन्दर
मेल तुम्हारा सूरज के संग
है प्यारा अभिराम समन्दर
दुनिया वाले सोये, जागे
करता रहता काम समन्दर
मीठापन आने तक सर को
पटको सुबहो-शाम समन्दर
साथ सुमन तो जीत मिलेगी
बदलो मत आयाम समन्दर

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपको सूचित किया जा रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शनिवार (18-04-2015) को "कुछ फर्ज निभाना बाकी है" (चर्चा - 1949) पर भी होगी!
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar said...

बढ़िया ग़ज़ल

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