Monday, November 2, 2015

बगावत आईना करता

हकीकत को दिखाने की शराफत आईना करता
किसी से प्यार होने पर शरारत आईना करता
नहीं कुछ याद रह पाता निहारे खुद को प्रेमी तो
दिखे प्रीतम की सूरत बस बगावत आईना करता

छुपाती क्रोध को दिल में तू सचमुच दामिनी लगती
किसी कारण से रूठी तो कसम से भामिनि लगती
मजा आता मशक्कत से अगर तुझको मना लूँ तो
जरा सा मुस्कुराओ तो यकीनन कामिनी लगती

मेरी चाहत कि सुर्खी में तेरा भी नाम आ जाए
सफल जीवन तभी होता किसी के काम आ जाए
चलो जी भर के जी लें हम हटाकर बंदिशें सारी
पता क्या कब कहाँ पे जिन्दगी की शाम आ जाए

मुहब्बत के बदौलत ही जहां आबाद रह पाता
परिन्दा पर मुहब्बत का कहां आजाद रह पाता
तुम्हारे प्यार में खोकर मिटाया खुद को यूँ मैंने
नहीं कुछ भूल पाता हूँ नहीं कुछ याद रह पाता

1 comment:

Rushabh Shukla said...


सुन्दर ..... मेरे ब्लॉग पर आपके आगमन की प्रतीक्षा |

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