Thursday, September 7, 2017

मानवता को रौंदकर

आज कहाँ कानून है, कैसा हुआ समाज?
मारे जाते, जो करे, अब ऊँची आवाज।।

मानवता ही धर्म है, मानवता से प्यार।
इस खातिर मरना पड़े, मरने को तैयार।।

भले करा दो चुप मुझे, रहे कलम क्या मौन?
परिवर्तन की आग को, बुझा सका है कौन??

मानवता को रौंदकर, बाँटो नहीं अधर्म।
या मानवता से बड़ा, बता कौन सा धर्म।।

अच्छे दिन भी आ गए, यूँ भारत खुशहाल।
देख कृषक की खुदकुशी, सुमन सभी बेहाल।। 

7 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (09-09-2017) को "कैसा हुआ समाज" (चर्चा अंक 2722) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar said...

सुन्दर प्रस्तुति

Pushpendra Dwivedi said...

waah bahut badhiya khoob soorat rachna



http://www.pushpendradwivedi.com/%E0%A5%9E%E0%A4%BF%E0%A5%9B%E0%A4%BE%E0%A4%93%E0%A4%82-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%9C%E0%A5%8B-%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B9%E0%A4%AC%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A4%A4-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AA/

Rajesh kumar Rai said...

वाह ! खूबसूरत प्रस्तुति ! बहुत खूब आदरणीय ।

Jyoti Dehliwal said...

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।

Ravindra Singh Yadav said...

मानवता की हिमायत और उस पर मनन की भावभूमि तैयार करती उत्तम रचना. बधाई एवं शुभकामनायें.

RADHA TIWARI said...

सुन्दर सृजन

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