Wednesday, April 17, 2024

मर-मर करके जीते हैं

मन-भर  कितने जी  पाते पर, मन भर-भर के जीते हैं 
आपस में  ही सुमन चमन के, लड़-लड़ करके जीते हैं

वर्ग-विभाजन  फूलों में भी, माली जब खुद करता हो 
उपवन  में  कम   गिनती जिसकी, डर-डर के जीते हैं

पौधे  विवश  हुए उपवन के, बिना खाद और पानी के
बारिश,  जाड़ा,  गरमी  में  भी, थर-थर करके जीते हैं

इतना सुन्दर सजा बगीचा, जिस माली की मिहनत से
उनका  दोष  गिने  ये  माली, बड़-बड़  करके  जीते हैं 

जीवन  सबका इस  दुनिया में, मानो सचमुच नेमत है
उजड़  गए हैं  यहाँ चमन कुछ, मर-मर करके जीते हैं

No comments:

हाल की कुछ रचनाओं को नीचे बॉक्स के लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं -
रचना में विस्तार
साहित्यिक  बाजार  में, अलग  अलग  हैं संत। जिनको  आता  कुछ  नहीं, बनते अभी महंत।। साहित्यिक   मैदान   म...
अन्ध-भक्ति है रोग
छुआछूत  से  कब  हुआ, देश अपन ये मुक्त?  जाति - भेद  पहले  बहुत, अब  VIP  युक्त।। धर्म  सदा  कर्तव्य  ह...
गन्दा फिर तालाब
क्या  लेखन  व्यापार  है, भला  रहे  क्यों चीख? रोग  छपासी  इस  कदर, गिरकर  माँगे  भीख।। झट  से  झु...
मगर बेचना मत खुद्दारी
यूँ तो सबको है दुश्वारी एक तरफ  मगर बेचना मत खुद्दारी एक तरफ  जाति - धरम में बाँट रहे जो लोगों को  वो करते सचमुच गद्दारी एक तरफ  अक्सर लो...
लेकिन बात कहाँ कम करते
मैं - मैं पहले अब हम करते  लेकिन बात कहाँ कम करते  गंगा - गंगा पहले अब तो  गंगा, यमुना, जमजम करते  विफल परीक्षा या दुर्घटना किसने देखा वो...
विश्व की महान कलाकृतियाँ- पुन: पधारें। नमस्कार!!!