Tuesday, December 22, 2009

मन-मीत

‍मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।।

कहने को होते कुछ अपना।
लेकिन सच अपनापन सपना।
समझौते लाखों कर लें पर,
रहता जीवन में अनबन-सा।
‍मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।।

अनजाने में प्यार किसी से।
क्या जीवन-व्यवहार उसी से?
इस उलझन में उलझ के जीवन,
बनता पतझड़ के उपवन-सा।
‍मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।।

जिसकी खातिर हम जीते हैं।
समय समय पर गम पीते हैं।
वह रकीब जब बन जाता है,
तब लगता जीवन बंधन-सा।
‍मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।।

रोज सीखते जो जीवन से।
संघर्षों से, स्पन्दन से।
उस पलास का जीवन कैसा?
जीता खुशबू-हीन सुमन-सा।
‍मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।।

28 comments:

संगीता पुरी said...

यही तो जीवन है .. बहुत अच्‍छी अभिव्‍यक्ति दी आपने विचारों को !!

रचना दीक्षित said...

‍मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।।

आपकी स्मृति दीर्घा लांघते हुए कब अपनी दीर्घा में पहुँच गयी पता ही नहीं चला बहुत बधाई इस सुंदर प्रस्तुति

निर्मला कपिला said...

जिसके खातिर हम जीते हैं।
समय समय पर गम पीते हैं।
वह रकीब जब बन जाता है,
तब लगता जीवन बंधन-सा।
‍मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।
सुमन जी आप की हर रचना जीवन का सच लिये होती है। बहुत सुन्दर है ये रचना बधाई

अजय कुमार said...

मन का मीत न मिले तो जीवन कठिन हो जाता है

डॉ महेश सिन्हा said...

ज्यादातर लोगों का जीवन इस निर्धनता में गुजरता है .लेकिन आज का मनुष्य शायद इस धन के बारे में ही भूल चुका है . गीत के माध्यम से आपने एक महत्वपूर्ण दशा के बारे में इंगित किया , सुंदर .

Mithilesh dubey said...

उम्दा व लाजवाब रचना , बधाई ।

ललित शर्मा said...

उस पलास का जीवन कैसा?
जीता खुशबू-हीन सुमन-सा।

बहुत सुंदर अभिव्यक्ति, आभार

रश्मि प्रभा... said...

जिसके खातिर हम जीते हैं।
समय समय पर गम पीते हैं।
वह रकीब जब बन जाता है,
तब लगता जीवन बंधन-सा।
‍मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।।
.......waah

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।बहुत बढ़िया रचना है।बधाई।

रोज सीखते जो जीवन से।
संघर्षों से, स्पन्दन से।
उस पलास का जीवन कैसा?
जीता खुशबू-हीन सुमन-सा।
‍मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।।

निर्झर'नीर said...

रोज सीखते जो जीवन से।
संघर्षों से, स्पन्दन से।
उस पलास का जीवन कैसा?
जीता खुशबू-हीन सुमन-सा।
‍मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।।

nihayat hi khoobsurat kavy rachna har lihhaj se .
bhaav ,shabd vinyas ,dhara pravaah man ko choo gayi aapki ye rachna

daad kubool karen

डॉ टी एस दराल said...

जिसके खातिर हम जीते हैं।
समय समय पर गम पीते हैं।
वह रकीब जब बन जाता है,
तब लगता जीवन बंधन-सा।
‍मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।।

बहुत सुन्दर रचना , सुमन जी। बधाई।

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर कविता कही आप ने , सच है अगर मन का मीत ना मिले तो जिन्दगी दुभर हो जाती है

मनोज कुमार said...

वेदना की अद्भुत अभिव्यक्ति ! कविता मे व्यंजित जिजीविषा और अदम्य उत्साह अनुकरणीय !!

"गिरा-अर्थ संयोग से काव्य-सुमन सुरभीत !
रसमय निर्झर कह रहा जीवन की यह रीत !!"

वन्दना said...

जिसके खातिर हम जीते हैं।
समय समय पर गम पीते हैं।
वह रकीब जब बन जाता है,
तब लगता जीवन बंधन-सा।
‍मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।।

bahut khoob.........bahut sundar sandesh deti rachna.

ज्ञानदत्त G.D. Pandey said...

वाह, क्या शब्द हैं -
समझौता लाखों कर लें पर,
रहता जीवन में अनबन-सा।

रंजना said...

जिसके खातिर हम जीते हैं।
समय समय पर गम पीते हैं।
वह रकीब जब बन जाता है,
तब लगता जीवन बंधन-सा।
‍मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।।

.........

WAAH BHAIYA WAAH !!!! LAJAWAAB !!!!

SACHMUCH MAN KO MATH KAR JO MOTI NIKLA HAI,WAH ANMOL HAI.....

संजय भास्कर said...

मन का मीत न मिले तो जीवन कठिन हो जाता है

संजय भास्कर said...

बहुत सुंदर कविता कही आप ने , सच है अगर मन का मीत ना मिले तो जिन्दगी दुभर हो जाती है

'अदा' said...

जिसके खातिर हम जीते हैं।
समय समय पर गम पीते हैं।
वह रकीब जब बन जाता है,
तब लगता जीवन बंधन-सा।
‍मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।

बहुत सुन्दर पंक्तियाँ हैं भैया...
ये भाव भी जाने पहचाने हैं...ऐसा ही तो लगता है..!!

M VERMA said...

जिसके खातिर हम जीते हैं।
समय समय पर गम पीते हैं।
वह रकीब जब बन जाता है,
तब लगता जीवन बंधन-सा।
वाकई तब तो जीवन बन्धन सा लगेगा ही. बहुत ही सुन्दर है आपकी अभिव्यक्ति
बेहतरीन

Sadhana Vaid said...

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति है । बधाई स्वीकारें

योगेश स्वप्न said...

जिसके खातिर हम जीते हैं।
समय समय पर गम पीते हैं।
वह रकीब जब बन जाता है,
तब लगता जीवन बंधन-सा।
‍मन को मीत मिला न मन-सा।
भाव-जगत में हूँ निर्धन-सा।

behatareen panktian, lajawaab abhivyakti suman ji dil ko chhhote shabd.

हर्षिता said...

अच्छी रचना है।

श्यामल सुमन said...

दिया आपने बहुत ही प्यार।
प्रेषित है सबको आभार।
है चाहत कि और कहें कुछ,
मानें इसको भाव-नमन-सा।।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

हिमांशु । Himanshu said...

जीवन के रंग समेटे खूबसूरत रचना । आभार ।

मथुरा कलौनी said...

बहुत भावभीनी पंक्तियॉ है।
मन-सा मीत न मिले तो बना लीजिये। भाव-जगत भर जायेगा।
इस अच्‍छी कविता के लिये बधाई।

गौतम राजरिशी said...

बहुत सुंदर गीत गुरुदेव! बहुत ही सुंदर...मुखड़ा तो इतना भाया कि चुरा कर ले जा रहा हूँ।

"जिसके खातिर हम जीते हैं।
समय समय पर गम पीते हैं।
वह रकीब जब बन जाता है,
तब लगता जीवन बंधन-सा"

अहा...!!!

nawab said...

नमस्ते अंकल..
इतना गहरा अर्थ छिपाए ये गीत, मुझ जैसे नासमझ को कहाँ समझ आता..
आपने समझाया तो हर एक पंक्ति ने मेरे भाव जगत को धनी कर दिया..
निवेदन है की इस गीत की संक्षिप्त व्याख्या भी पोस्ट करें..

शशिकान्त

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