Friday, October 29, 2010

तब जीवन श्रृंगार प्रभु

सबकी है सरकार प्रभु
क्या सबको अधिकार प्रभु

आमलोग हैं मुश्किल में
इतना अत्याचार प्रभु

साफ छवि लाजिम जिनकी
करते भ्रष्टाचार प्रभु

मँहगाई, आतंकी सुरसा
दिल्ली है लाचार प्रभु

रिश्ते - नाते आज बने
क्यों कच्चा व्यापार प्रभु

अवसर सबको मिल पाए
तब जीवन श्रृंगार प्रभु

लोग खोजते जीवन में
जीने का आधार प्रभु

देव-भूमि भारत में अब
क्यों सबकुछ बेकार प्रभु

हर युग में करते आये
जुल्मों का संहार प्रभु

सुमन आस को तोडो मत
क्या लोगे अवतार प्रभु

18 comments:

अशोक बजाज said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

M VERMA said...

मँहगाई, आतंकी डर से
दिल्ली है लाचार प्रभु
वाकई लाचार है. बहुत सुन्दर रचना

संजय भास्कर said...

साफ छवि लाजिम है जिनकी
करते भ्रष्टाचार प्रभु
अतिसुन्दर इस रचना के माध्यम से आपने बखूबी बयां किया है...

मनोज कुमार said...

साफ छवि लाजिम है जिनकी
करते भ्रष्टाचार प्रभु
बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
राजभाषा हिंदी पर मुग़ल काल में सत्ता का संघर्ष
मनोज पर फ़ुरसत में...भ्रष्‍टाचार पर बतिया ही लूँ !

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत अच्छी रचना ...देश की सही परिस्थिति को बताती हुई

राज भाटिय़ा said...

मँहगाई, आतंकी डर से
दिल्ली है लाचार प्रभु
अति सुन्दर रचना

गुड्डोदादी said...

श्यामल जी
चिरंजीव भव:

साफ छवि लाजिम है जिनकी
करते भ्रष्टाचार प्रभु

बहुत अद्धभुत याचना
फिर आपने लिखा


लोग खोजते अब जीवन में
जीने का आधार प्रभु

एकदम सच हम उस देश के वासी है जिस देश में गंगा बहती है

शेइला said...

सुना युगों से करते आये
जुल्मों का संहार प्रभु

कितने दर्द से लिखी पंक्ति

इतने जुल्म सहने के बाद

आखिर क्या हैं उसके ह्रदय के भीतर

सुज्ञ said...

श्यामल जी व्यथा सकार हुई है,
किसको है इन्कार प्रभु॥

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

रिश्ते-नाते आज बने
क्यों कच्चा-सा व्यापार प्रभु..
--
प्रश्न और उत्तर
साथ में आशा
गज़ल में सहेजी है
सुन्दर अभिलाषा!
--
बहुत बहुत शुभकामनाएँ!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

रिश्ते-नाते आज बने
क्यों कच्चा-सा व्यापार प्रभु..
--
प्रश्न और उत्तर
साथ में आशा
गज़ल में सहेजी है
सुन्दर अभिलाषा!
--
बहुत बहुत शुभकामनाएँ!

रंजना said...

ओह...क्या लिखा है आपने ....लाजवाब !!!

यथार्थ को प्रभावशाली ढंग से उकेरती अतिसुन्दर रचना..

हर दोहा मन में उतर दाद लूट गया....

भैया,बीच बीच में आप लम्बी रेलयात्राएँ करते रहिये..

अनुपमा पाठक said...

अवसर सबको मिले बराबर
यह जीवन श्रृंगार प्रभु
waah!
sundar!!!

अनुपमा पाठक said...

अवसर सबको मिले बराबर
यह जीवन श्रृंगार प्रभु
waah!
sundar!!!

mahendra verma said...

सुमन आस है, नहीं डरोगे
क्या लोगे अवतार प्रभु।

बेहतरीन रचना, बेहतरीन भाव।

चन्द्र कुमार सोनी said...

i liked it.
thanks.
WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM

गुड्डोदादी said...

श्यामल जी
चिरंजीव भव:

देव-भूमि भारत में अब तो
लगता सब बेकार प्रभु

बहुत वेदना है आपकी कविता में
मेरी भी विनती सुन लीजीये

बलिदान की हो मेरी डगर
यही मांगती हूँ मै तुमसे वर

प्रवीण पाण्डेय said...

सच है,

कर डालो संहार प्रभु।

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