अंदाज उनका कैसे बिन्दास हो गया
महफिल में आम कलतक वो खास हो गया
जिसे कैद में होना था संसद चले गए,
क्या चाल सियासत की आभास हो गया
रुकते ही कदम जिन्दगी मौत हो गयी
प्रतिभा जो होश में थी क्यों आज सो गयी
कल पीढ़ियाँ करेंगी इतिहास से सवाल,
क्यों मुल्क बचाने की नीयत ही खो गयी
मरते हैं लोग भूखे बिल्कुल अजीब है
सड़ते हैं वो अनाज जो बिल्कुल सजीव है
जल्दी से लूट बन्द हो दिल्ली से गाँव तक,
फिर कोई कैसे कह सके भारत गरीब है
आतंकियों का मतलब विस्तार से यारो
शासन की कोशिशे भी संहार से यारो
फिर भी हैं लोग खौफ में तो सोचता सुमन,
नक्सल से अधिक डर है सरकार से यारो
Saturday, October 30, 2010
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रचना में विस्तार
साहित्यिक बाजार में, अलग अलग हैं संत। जिनको आता कुछ नहीं, बनते अभी महंत।। साहित्यिक मैदान म...
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अन्ध-भक्ति है रोग
छुआछूत से कब हुआ, देश अपन ये मुक्त? जाति - भेद पहले बहुत, अब VIP युक्त।। धर्म सदा कर्तव्य ह...
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गन्दा फिर तालाब
क्या लेखन व्यापार है, भला रहे क्यों चीख? रोग छपासी इस कदर, गिरकर माँगे भीख।। झट से झु...
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मगर बेचना मत खुद्दारी
यूँ तो सबको है दुश्वारी एक तरफ मगर बेचना मत खुद्दारी एक तरफ जाति - धरम में बाँट रहे जो लोगों को वो करते सचमुच गद्दारी एक तरफ अक्सर लो...
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लेकिन बात कहाँ कम करते
मैं - मैं पहले अब हम करते लेकिन बात कहाँ कम करते गंगा - गंगा पहले अब तो गंगा, यमुना, जमजम करते विफल परीक्षा या दुर्घटना किसने देखा वो...
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विश्व की महान कलाकृतियाँ-
14 comments:
श्यामल जी
कल पीढ़ियाँ करेंगी इतिहास से सवाल,
क्यों मुल्क बचाने की नीयत ही खो गयी
नहीं हिम्मत हो रही देश के दुःख और दुखी जनता की वेदना
यही जवाब देंगे
अमन चोर देश का अमन बेचते हैं
वे दिल्ली में बैठे वतन वेचते हैं
नक्सल से अधिक डर है सरकार से यारो
यकीनन नक्सल तो है ही नक्सल पर सरकार भी जब नक्सली होने लगे तो ...
सुन्दर रचना
बहुत सुंदर रचना !!
नक्सल से अधिक डर है सरकार से यारो
vartamaan stithiyon ko sundarta se pratyaksh kiya hai!
regards,
जिसे कैद में होना था संसद चले गए,
यही चाल है सियासत, पर्दाफाश हो गया।
अंदाज उनका कैसे बिन्दास हो गया
कल तक जो आम था वही अब खास हो गया
--
सुन्दर नज्म है!
बहुत सटीक बातें की हैं ..अनाज सद् रहा है लोंग भूखे हैं , जिसकी जगह जेल थी वो संसद में है ..बहुत खूब
बहुत बेबाक रचना ।
लेकिन आजकल सच को कौन सुनना चाहता है ।
bhaayi jaan dilli srkar ki dukhti ns pr haath rkh diya he bhut khub kmaal kr diya he bdhaayi ho. akhtar khan akela kota rajsthan
जिसे कैद में होना था संसद चले गए,
यही चाल है सियासत, पर्दाफाश हो गया।
कोई तो आ कर इन से हिसाब पुछेगा... बहुत सुंदर रचना धन्यवाद
ati-uttam.
thanks.
WWW.CHANDERKSONI.BLOGSPOT.COM
फिर भी हैं लोग खौफ में तो सोचता सुमन,
नक्सल से अधिक डर है सरकार से यारो
वार्ताकारों से आतंकियों ने कहा !
जो यक़ीन तुम पर है हमको, नेताओं पर नहीं रहा !!
चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 02-11-2010 मंगलवार को ली गयी है ...
कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया
शानदार रचना सुमन जी. और वाकई में जिन्हें हम कल थोड़ा बहुत अपना समझते थे आज वे सब सो गए, लगता है. "नक्सल से अधिक डर है सरकार से यारो ...." हकीकत को बयां करती आपकी यह रचना तारीफे काबिल है.
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