Monday, June 6, 2011

मगर आँख में नीर है

कंचन चमक शरीर है
मगर आँख में नीर है

जिसकी चाहत वही दूर में
कैसी यह तकदीर है

मिल न पाते मिलकर के भी
किया लाख तदबीर है

लोक लाज की मजबूती से
हाथों में जंजीर है

दिल की बातें कहना मुश्किल
परम्परा शमसीर है

प्रेम परस्पर न हो दिल में
व्यर्थ सभी तकरीर है


पी कर दर्द,खुशी चेहरे पर
यही सुमन तस्वीर है

9 comments:

ana said...

कंचन चमक शरीर है
मगर आँख में नीर है

bahut badhiya ....dil ko chhoo lene wali kavita

प्रवीण पाण्डेय said...

अपना मन मैं कह ना पाया,
जो कहता वह नीर है।

Mukesh Kumar Sinha said...

bahut pyari si rachna....:)

AlbelaKhatri.com said...

waah waah waah

ati uttam !

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...

इतनी छोटी बहर में इतनी प्‍यारी रचना, सचमुच कमाल कर दिया आपने।

---------
बाबूजी, न लो इतने मज़े...
भ्रष्‍टाचार के इस सवाल की उपेक्षा क्‍यों?

रंजना said...

वाह...वाह...वाह...

स्वाति said...

कंचन चमक शरीर है
मगर आँख में नीर है

जिसकी चाहत वही दूर में
कैसी यह तकदीर है

मिल न पाते मिलकर के भी
किया लाख तदबीर है

लोक लाज की मजबूती से
हाथों में जंजीर है

वाहवाह ,,,, आपने तो गागर में सागर भर दिया है ......

Dr (Miss) Sharad Singh said...

लोक लाज की मजबूती से
हाथों में जंजीर है
दिल की बातें कहना मुश्किल
परम्परा शमसीर है


बहुत सुन्दर शेर...वाह !

निर्झर'नीर said...

कंचन चमक शरीर है
मगर आँख में नीर है


NI:shabd kar diya

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