यूँ तो हम सब भाई भाई, ब्लागिंग के इस प्रांगण में
मगर सहजता की मँहगाई, ब्लागिंग के इस प्रांगण में
नमन सभी रचनाकारों को, जो प्रायः ब्लागिंग करते
बरसों उनसे प्रीत लगाई, ब्लागिंग के इस प्रांगण में
जिस रचना में हित समाज का, कहते हैं साहित्य उसे
देखी फिर भी कई लड़ाई, ब्लागिंग के इस प्रांगण में
कुछ पाठक ऐसे भी होते, सबकी पढ़ते, चुप रहते
इसमें किसको, क्या कठिनाई, ब्लागिंग के इस प्रांगण में
कभी नहीं बेचारा बनकर, जी कर लिखने की कोशिश
भला छींटना क्यों रोशनाई, ब्लागिंग के इस प्रांगण में
जिसने जैसा चश्मा पहना, दिखता वैसा रंग उन्हें
करते क्युँ अपनी ही बड़ाई, ब्लागिंग के इस प्रांगण में
कोमल भाव हृदय में जन्मे, तब कविता बन पाती है
जिसकी करते लोग खिंचाई, ब्लागिंग के इस प्रांगण में
ब्लागिंग तो परिवार एक है, भरे हुए विद्वान यहाँ
सीख रहा जिनसे कविताई, ब्लागिंग के इस प्रांगण में
मंच एक विद्यालय जैसा, मिल के सब लिखते पढ़ते
सुमन हृदय की ये सच्चाई, ब्लागिंग के इस प्रांगण में
Saturday, January 21, 2012
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16 comments:
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!
कुछ पाठक ऐसे भी होते, सबकी पढ़ते, चुप रहते
इसमें किसको, क्या कठिनाई, ब्लागिंग के इस प्रांगण में
पढ़कर भी चुप रहते , कुछ क्यों न कहते
बात यही समझ न आई , ब्लागिंग के इस प्रांगण में। :)
शुभकामनायें आपको सुमन जी ।
जिसने जैसा चश्मा पहना, दिखता वैसा रंग उन्हें
करते क्युँ अपनी ही बड़ाई, ब्लागिंग के इस प्रांगण में
वाह वाह !!
वाह वाह..........
बहुत बढ़िया...एक एक शब्द सटीक...
लाजवाब!!!
बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
--
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी लगाई है!
सूचनार्थ!
वाह बहुत सुंदर लेखनी
शब्द शब्द सच में भीगा हुआ
सीधा दिल में उतरता चला गया
ये ब्लोगिंग अब एक नशा जैसे महसूस होने लगा हैं
करो तो मुसीबत ,ना करो तो और भी परेशानी
श्यामल
आशीर्वाद सदा सुखी रहो
जिसने जैसा चश्मा पहना, दिखता वैसा रंग उन्हें
करते क्युँ अपनी ही बड़ाई, ब्लागिंग के इस प्रांगण में
बहुत खूब बधाई
अब तो देखो ब्लागिंग ही हर पृष्ठ पर
ना जात ना पात वही ढाक के तीन पात ब्लागिंग
सभी के बारे में लिख दिया आपने ..:)
kalamdaan.blogspot.com
मन की सच्चाईयों का
विचारों की अंगडा़ईयों का
विवादों की शइनाईयों का
करते रहिए सदा स्वागत
चिट्ठाकारी के अंगने में
जो मजा है सच कहने में
नहीं वह कभी मन मसोसने में
सोचने का असर जाता नहीं
कविता पढ़े बिना रहा जाता नहीं।
हीर शब्द जो यहाँ व्याप्त थे, उनसे जुड़कर और आपसे,
कविता की तरुणाई पायी, ब्लॉगिंग के इस प्रांगण में
wah wah.....prasanganuroop shabdo ka chayan
बेहतरीन।
सादर
कल 23/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!
कभी नहीं बेचारा बनकर, जी कर लिखने की कोशिश
भला छींटना क्यों रोशनाई, ब्लागिंग के इस प्रांगण में
पूरी कविता में सच ही सच
सुनार ने सोने को आग में तपा कर रूप निखार
दिया
बहुत ख़ूबसूरत रचना! सच्चाई को आपने बहुत सुन्दरता से शब्दों में पिरोया है! आपकी लेखनी को सलाम !
मंच एक विद्यालय जैसा, मिल के सब लिखते पढ़ते
सुमन हृदय की ये सच्चाई,ब्लागिंग के इस प्रांगण में
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!
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