Wednesday, August 22, 2012

क स म क श

कंचन काया कामिनी, कायम क्रम कुछ काल।
कायम कई कराल के, कारण कृश कंकाल।।

सम्भव सपने से सुलभ, सुन्दर-सा सब साल।
समुचित सहयोगी सुमन, सुलझे सदा सवाल।।

मन्द मन्द मुस्कान में, मस्त मदन मनुहार।
मारक मुद्रा मोहिनी, मुदित मीत मन मार।।

किससे कब कैसे कहें, करना क्या कब काम।
कारण कितने कलह के, कहते कई कलाम।।

शय्या शोभित श्यामली, शुद्ध शुभंकर शाम।
शिला शिखर शंकर शिविर, शिखा शमन शिवनाम ।।

6 comments:

RITU said...

वाह अति सुन्दर ..कठिन शब्दों का अर्थ भी दीजिये..तो चार चाँद लग जाएँ

प्रवीण पाण्डेय said...

जय हो, पढ़कर आनन्द आ गया।

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 24/08/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

गुड्डोदादी said...


मन्द मन्द मुस्कान में, मस्त मदन मनुहार।
मारक मुद्रा मोहिनी, मुदित मीत मन मार।।
(अति सुंदर छंद लिखने की गति न बंद
सुंदर शब्दों का ताल मेल बुद्धि बुलंद)

expression said...

वाह वाह.....
अब कोई इन दोहों के काव्य सौंदर्य की विवेचना और कर दे आनंद दो गुना हो जाए..
बहुत सुन्दर!!!!!!

अनु

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत सुंदर दोहे ...

हाल की कुछ रचनाओं को नीचे बॉक्स के लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं -
विश्व की महान कलाकृतियाँ- पुन: पधारें। नमस्कार!!!