Saturday, November 24, 2012

आँसू को शबनम लिखते हैं

जिसकी खातिर हम लिखते हैं
वे कहते कि गम  लिखते हैं

आस पास का हाल देखकर
आँखें होतीं नम, लिखते हैं

पेट की ज्वाला शाँत हुई तो
आँसू को शबनम लिखते हैं

फूटे हैं गलती से पटाखे
थानेवाले बम लिखते हैं

प्रायोजित रचना को कितने
हो करके बेदम लिखते हैं

चकाचौंध में रहकर भी कुछ
अपने भीतर तम लिखते हैं

कागज करे सुमन क्यों काला
काम की बातें हम लिखते हैं।

18 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

दिन भर भाव विषम उठते हैं,
शाम हुयी तो सम लिखते हैं

रविकर said...

शुभकामनायें ।



लिखे निरर्थक अधिक पर, करे काम की बात ।

दुनिया में खुश्बू भरे, दे नफरत को मात ।।

रविकर said...

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

kshama said...

जिसकी खातिर हम लिखते हैं
वे कहते कि गम लिखते हैं
Gam hai to gam likhenge....kya karen!

ANULATA RAJ NAIR said...

वाह...
बहुत सुन्दर...
चकाचौंध में रहकर भी कुछ
अपने भीतर तम लिखते हैं...
ये तो लाजवाब..

अनु

Amit Chandra said...

बहुत खुब.

Amit Chandra said...

बहुत खुब.

Asha Joglekar said...

वाह वाह वे क्या लिखते हैं ।

गुड्डोदादी said...



दूसरों के गम देख आय अश्रू
अपने तम बहुत कम लगते हैं

Shikha Kaushik said...

बहुत सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति . आभार .
हम हिंदी चिट्ठाकार

Shalini kaushik said...

बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति .
नारी के अकेलेपन से पुरुष का अकेलापन ज्यादा घातक

sushma verma said...

बहुत सुंदर मन के भाव ...
प्रभावित करती रचना .

Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून said...

वाह ऑंसू को शबनम लि‍खते हैं

Unknown said...

बहुत बढ़िया रचना

Unknown said...

बेहद सार्थक पोस्‍ट

Anju (Anu) Chaudhary said...

खूबसूरत प्रस्तुति

Unknown said...

बहुत खूब.....

amyt zangir said...

बहुत खूब..

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