Thursday, August 22, 2013

जिन्दगी बस प्यार है

क्यों भला कहते हो प्यारे जिन्दगी निस्सार है
जिन्दगी जी करके देखो जिन्दगी बस प्यार है

मौत तो आएगी एक दिन ये पता किसको नहीं
इसके डर से बैठता वह आदमी बीमार है

जोड़ने या फिर घटाने में परेशां हर कोई
जिन्दगी एहसास है या इक नया व्यापार है

भूलकर इन्सानियत को जीतने की है ललक
मेरा मज़हब तेरा मज़हब व्यर्थ की तकरार है

आदमी होने का मतलब तब सफल होगा सुमन
ज्ञान से रौशन हो दुनिया प्रेम इक आधार है

6 comments:

Amrita Tanmay said...

वाह!

कालीपद प्रसाद said...

भूलकर इन्सानियत को जीतने की है ललक
मेरा मज़हब तेरा मज़हब व्यर्थ की तकरार है...
बहुत सुन्दर ग़ज़ल
latest post आभार !
latest post देश किधर जा रहा है ?

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

क्या बात बधाई!

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

क्या बात बधाई!

शिवनाथ कुमार said...

जिन्दगी का आधार यदि प्रेम हो तो फिर जिन्दगी हो जाती है गुलजार
बहुत सुन्दर, आभार !

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत खूब, धुँआधार

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