Wednesday, October 29, 2014

ललक रखो तुम आँखों में

जीवन चलता भले धरा पर फलक रखो तुम आँखों में
गम के दिन में भी खुशियों की झलक रखो तुम आँखों में
नहीं सुमन कहलाता जीवन केवल साँसों का चलना
हाल बुरा फिर भी जीने की ललक रखो तुम आँखों में

चकाचौंध बाहर है जितना मन में उतना अंधकार है 
दिवाली त्योहार तो है पर सुमन ज्ञान का इक विचार है
हाथ मिलाकर जीना सीखो दीप से दीप जलाओ
दीप जले सबके देहरी यह भारत का इक संस्कार है 

अपने ढंग से बोल रहे सब सुनने को तैयार नहीं
अगर सुने तो यारी अपनी ना सुनने पर यार नहीं
धन-पद से प्रायः तय होता ज्यादा काबिल कौन यहाँ
होड़ मची काबिल बनने की चमन सुमन से प्यार नहीं

तुमसे मिलने की चाहत थी मिलकर तुमसे आस जगी
वो कोमल अनुभूति कहूँ क्या दिल में बिल्कुल खास जगी
कई बार ऐसा क्यों होता मिल के भी मिलना मुश्किल
हुआ सुमन के सँग यही जब फिर मिलने की प्यास जगी

महलों में दुनिया के मालिक क्या चिन्ता संतान की
इस दुनिया को नहीं जरूरत और अधिक धनवान की
मानवता ही नहीं बची तो खाक बचेगी ये दुनिया
कदम कदम पर सुमन जरूरत नित बेहतर इन्सान की

3 comments:

शिवनाथ कुमार said...

बिलकुल सच कहा आपने दुनिया को धनवानों की नहीं इंसानों की जरुरत है
बेहद सुन्दर भाव !

आशीष अवस्थी said...

बहुत हि सुंदर , धन्यवाद !
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आपकी इस रचना का लिंक दिनांकः 3 . 11 . 2014 दिन सोमवार को I.A.S.I.H पोस्ट्स न्यूज़ पर दिया गया है , कृपया पधारें धन्यवाद !

Rs Diwraya said...

अतिसुन्दर लेखन
आभार
मेरे ब्लॉग पर स्वागत है।

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