Thursday, June 23, 2016

यह आयोजन सरकारी है

अच्छे दिन की तैयारी है
या रोने की फिर बारी है

क्यों दशकों से छले गए हम
नादानी या लाचारी है

वादे बदले, शासक बदला
जनता अबतक बेचारी है

कौन धरम है ऊंचा, नीचा
इस पर भी मारामारी है

मानवता भी गयी रसातल
यह आयोजन सरकारी है

दहशतगर्दी बढती जाती
कारण घर घर बेकारी है

लूटा जिसने देश अभीतक
नेता, मंत्री, अधिकारी हैं

इसे कहें क्यों सहनशीलता
सच पूछो तो बीमारी है

अब तो जागो देशवासियों
सुमन व्यवस्था हत्यारी है

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (26-06-2016) को "लो अच्छे दिन आ गए" (चर्चा अंक-2385) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar said...

बहुत खूब

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विश्व की महान कलाकृतियाँ- पुन: पधारें। नमस्कार!!!