Tuesday, May 27, 2014

आँखों की तासीर

बन्द आँख में जो दिखे, सपने सब बेकार।
खुली आँख के स्वप्न ही, हो पाते साकार।।

भाव उपजते आँख जो, वो मन की तस्वीर।
मजा, बे-मजा जिन्दगी, आँखों की तासीर।।

आँखों आँखों में हुईं, तुमसे आँखें चार।
होठों से बातें नहीं, मूक अभी तक प्यार।।

आँखों में डूबा मगर, नहीं बुझी है प्यास।
कुछ आँखों में है चमक, लगते अधिक उदास।।

अच्छा है या फिर बुरा, प्रेमी समझ न पाय।
छले गए कुछ आँख से, कोई आँख बिछाय।।

तेरी सूरत यूँ बसी, आकर मेरे नैन।
बन्द आँख हो या खुली, दिखती हो दिन-रैन।।

खुशी दिखे बस आँख में, है आँखों में  पीड़।
चाहत तेरी आँख में, बने सुमन का नीड़।।

7 comments:

kuldeep thakur said...

नयी पुरानी हलचल का प्रयास है कि इस सुंदर रचना को अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
जिससे रचना का संदेश सभी तक पहुंचे... इसी लिये आप की ये खूबसूरत रचना दिनांक 29/05/2014 को नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही है...हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...

[चर्चाकार का नैतिक करतव्य है कि किसी की रचना लिंक करने से पूर्व वह उस रचना के रचनाकार को इस की सूचना अवश्य दे...]
सादर...
चर्चाकार कुलदीप ठाकुर
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कालीपद "प्रसाद" said...

बहुत खुबसूरत रचना !बधाई !
new post ग्रीष्म ऋतू !

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन मिलिये नए मंत्रीमंडल से - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

निवेदिता श्रीवास्तव said...

खुशी दिखे बस आँख में, है आँखों में पीड़।
चाहत तेरी आँख में, बने सुमन का नीड़।।
.....बेहतरीन !!!

आशीष अवस्थी said...

बढ़िया प्रस्तुति व सुंदर रचना !
I.A.S.I.H - ब्लॉग ( हिंदी में समस्त प्रकार की जानकारियाँ )

Onkar said...

सुंदर पंक्तियाँ

Unknown said...

वाह... बेहतरीन रचना....

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विश्व की महान कलाकृतियाँ- पुन: पधारें। नमस्कार!!!