Tuesday, August 30, 2022

बेच रहे क्यों टुकड़े टुकड़े?

राजन्! जनता आज हताश।
बेच रहे क्यों टुकड़े टुकड़े, लोगों का विश्वास।।
राजन्! जनता -----

राजा की पहले भी सबने, देखी है मनमानी।
अहंकार में भूल गए जो, सत्ता आनी जानी।
परेशान लोगों को तुमसे, आस लगी थी खास।।
राजन्! जनता -----

बाहर मीठे बोले तुम्हारे, अंदर क्या बतलाओ?
पहले के राजा और तुममें, अन्तर क्या बतलाओ?
आमजनों के घर में फाका, तेरे घर में रास।।
राजन्! जनता -----

भूल गए हो तुम क्यों प्यारे, क्या है फर्ज तुम्हारा?
काम देख तू इतिहासों में, क्या क्या दर्ज तुम्हारा?
तेरे जाने से मुमकिन है, बुझे सुमन की प्यास।।
राजन्! जनता -----

Tuesday, August 23, 2022

मैं सबमें, मुझमें सब देखो

देख कभी, चाहे अब देखो
मैं सबमें, मुझमें सब देखो

वही खुदा हैं, चोरों के भी
नित चोरों के करतब देखो

मंदिर मस्जिद में नक्काशी
सुन्दर पत्थर या रब देखो

तन सोता पर साँसें चलतीं
रुक जाए, तन को तब देखो

रोज परख, खुद की सच्चाई
नहीं अभी तो फिर कब देखो?

मुँह मोड़े, जो सच्चाई से
ऑंखें रहतीं डब डब देखो

दर्पण पास सुमन के हरदम
तेरी इच्छा, जब जब देखो

वही डराते लोग को

करता आज शिकार तू, लेकर जो हथियार।
कल शायद तू भी बने, उसका एक शिकार।। 

वही डराते लोग को, जो खुद में भयभीत।
इस कारण दुश्मन बने, कल तक जो थे मीत।।

शासन से पूछे अगर, कोई उचित सवाल।
तब शासक का देखिए, रूप गजब विकराल।।

आमजनों को लूटना, यही सियासी खेल।
मत भूलें शासक कभी, जनता हाथ नकेल।।

साँप, नेेवले अब चढ़े, जा कर एक मचान।
राजनीति में नित नया, मुमकिन है तूफान।।

सभी दलों पर देखिए, लगे हुए हैं दाग।
सुलग रही अब लोग में, परिवर्तन की आग।।

लोक जागरण के लिए, लिखे सुमन कुछ रोज।
जीवन जीने के लिए, नित्य जरूरी खोज।।

Sunday, August 21, 2022

तब कान्हा तुम आते हो

सूरज, बादल में छुप जाता, तब कान्हा तुम आते हो
राज कंस का जब जब आता, तब कान्हा तुम आते हो 

बहुत विवश होकर ही जनता, राजा का प्रतिकार करे
रौद्र रूप शासन दिखलाता, तब कान्हा तुम आते हो

आमजनों की मेहनत से ही, देश कोई खुशहाल रहे
मेहनतकश पे संकट छाता, तब कान्हा तुम आते हो

अहंकार में डूब के राजा, जब खुद को भगवान कहे
लोगों का हक छीन के खाता, तब कान्हा तुम आते हो

तारणहार तुझे कहते सब, लोक चेतना जगा सखे
दिल से तुझको सुमन बुलाता, तब कान्हा तुम आते हो 

भले हंसों सा चल पड़े कौवा

चाहे खुद से मलाल रखता हूँ 
घर में सबका खयाल रखता हूँ

दूर मुझसे जो, पास आएगा
प्रेम का ऐसा जाल रखता हूँ

भले पद से बड़े वो जितने भी
उनके आगे सवाल रखता हूँ

अपने हिस्से की रोटी बाँटा भी
दिल भी ऐसा विशाल रखता हूँ

भले हंसों सा चल पड़े कौवा
पर सुमन अपनी चाल रखता हूँ
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