Saturday, February 14, 2026

यादें पुरानी दे दो

रिश्ता   बहुत   पुराना,  यादें   पुरानी  दे  दो
धरती  तरस  रही  है, कुछ तो निशानी दे दो
पिघलो  जरा ऐ  बादल, रोना शुरू करो तुम 
प्यासी  धरा पे सबकी, आँखों में पानी दे दो

अपनी जो है निराशा, किसको दिखा रहे हो
शायद  यही  हताशा, किसको  दिखा रहे हो
अक्सर जो  बोलते  हैं, वो  खाक प्यार करते
ये  प्यार  क्या तमाशा, किसको दिखा रहे हो

पनघट पे  कोई  कैसे, प्यासा  ही  मर रहा है
कितनों  के आसमाँ छत, ऐसा भी घर रहा है
इन्सान  ही  तो  अक्सर, रुख मोड़ते हवा का
जालिम का सर झुका दे, ऐसा भी सर रहा है

बच्चे  बिना  जो  आँगन, सूना  बहुत  लगे हैं
बिन  फूल  जैसे  गुलशन, सूना  बहुत लगे हैं
तालाब,  कुएं  सूखे,  नदियाँ  सिकुड़  रहीं हैं
पानी   बिना  ये  जीवन, सूना  बहुत  लगे  हैं

अपनों  से  हो  जुदाई, रहना  बहुत कठिन है
आँसू  भरे  हैं दिल में, बहना  बहुत कठिन है
रस्मो - रिवाज   कैसे,  सोचे   सुमन  अकेला
बेटी  की  हो  विदाई, सहना  बहुत कठिन है

Thursday, July 10, 2025

खुशी या गम के मिलेंगे आँसू

नजर झुकाना या फिर उठाना, नजर मिलाना लगा हुआ है
मिली  मुहब्बत  में जो निशानी, वहीं निशाना लगा हुआ है

भले  हो  मेरा  या  घर तुम्हारा, सभी घरों की यही कहानी 
कसक मुहब्बत की जो है बाकी, उसे सुनाना लगा हुआ है 

चला  मुहब्बत के रास्ते जो, खुशी या गम के मिलेंगे आँसू
अगर किसीको जखम मिला तो, उसे छुपाना लगा हुआ है

बढ़ी  जो  दुनिया  है  रोज आगे, सदा मुहब्बत के रास्ते ही
मगर अभी नफरतों के शोले, से घर  जलाना लगा हुआ है 

सुमन  मुहब्बत  के ही सहारे, बचा ले पीढ़ी जो आनेवाली 
हमें  मिला  है  जो  पूर्वजों  से, उसे  सजाना  लगा हुआ है

Tuesday, July 1, 2025

डरे वो भीतर से

ये सबको  है  एहसास, डरे  वो  भीतर से।
सत्ता  की  जिसे  तलाश, डरे वो भीतर से।।

जीवन जीने का सपना, सुख-दुख है सबका अपना। 
सुख  की  चर्चा  से दूरी, बस केवल दुख को जपना।
महफिल में बनते खास, डरे वो भीतर से।।
सत्ता की जिसे -----

जिसको  भी  गले  लगाते, उसके घर आग जलाते। 
जिसने  भी  चाहा  इनको, अब  रो-रोकर पछताते। 
दिखते मन के ऐय्याश, डरे वो भीतर से।।
सत्ता की जिसे -----

वो  जाते  जहाँ  वहीं  के, पर  दर्शन  करे  मही के।
जब  कालचक्र  घूमे  तो, फिर  होते  नहीं कहीं के।
ये सुमन को है विश्वास, डरे वो भीतर से।।
सत्ता की जिसे -----

नारंगी इमर्जेन्सी

साधो! सब राजा इक संगी। 
कभी इमर्जेन्सी जो काली, अभी हुई नारंगी।।
साधो! सब राजा -----

लोक-लुभावन शब्द गढ़े नित, राजा एक दशक से। 
सबके सब  झूठे  साबित  पर, राजा चले ठसक से।
ऐसा   अंकुश   लोकतंत्र  पे,  हुई   सियासत  नंगी।।
साधो! सब राजा -----

सबको  आगे  बढ़ने  का  हक,  संविधान  देता  है। 
जाति-भेद बिनु शिक्षित सबको, सदा मान देता है।
पता  नहीं  वो  दिन  कब  आए, वेद  सुनाए भंगी।।
साधो! सब राजा -----

धर्म  एक  दुनिया  में जिसको, मानवता कहते हैं।
जो  इसके  विपरीत  चलें  तो, दानवता  कहते हैं।
देख  सुमन  फोटो  में राजा, बन के निकला जंगी।।
साधो! सब राजा -----

Monday, June 23, 2025

दुनिया कुछ सनकी के कारण

बिगड़  रहा है विश्व-समाज, 
कुछ शासक हैं जुमलेबाज, 
कौन  देश  है  किसका  साथी, खबरों  में यह शोर है।
दुनिया  कुछ सनकी के कारण, विश्वयुद्ध की ओर है।।

सभी देश में शासक आते, धनबल, नफरत के दम पर।
पर  मानवता  बढ़ती आगे, सदा  मुहब्बत  के  दम पर।
जहाँ   युद्ध  जारी   है  देखो,  विपदा  भी  घनघोर  है।।
दुनिया कुछ सनकी के कारण -----

घटनाओं  पर गौर करें तो, कुछ शासक अनपढ़ लगते। 
राजनीति के दृष्टिकोण से, कुछ बिल्कुल अनगढ़ लगते।
सभी  देश   में   तानाशाही,  लाने   पर  भी   जोर  है।।
दुनिया कुछ सनकी के कारण -----

जहाँ - जहाँ  सामंती  शासक, वहाँ - वहाँ आतंक बढ़े।
तब  विरोध  में सुमन इसी के, बलिदानी निःशंक बढ़े।
लोक - चेतना  आमजनों  में, जगे  तो  नूतन - भोर है।
दुनिया कुछ सनकी के कारण -----

हाल की कुछ रचनाओं को नीचे बॉक्स के लिंक को क्लिक कर पढ़ सकते हैं -
विश्व की महान कलाकृतियाँ- पुन: पधारें। नमस्कार!!!