Thursday, May 12, 2022

बता, कौन नादान आजकल

देखो, उनकी शान आजकल
पर फीकी मुस्कान आजकल

आस पास में सभी सयाने
बता, कौन नादान आजकल

जिसने झूठी अकड़ दिखायी
उठा रहे नुकसान आजकल

घर के मुखिया अक्सर लागे
अपने घर मेहमान आजकल

सज्जनता की खाल ओढ़कर
घूम रहे शैतान आजकल

घर में रहकर घरवालों से
घरवाले अनजान आजकल

टूटे फ़ूटे बोल सुमन के
खींचे सबका ध्यान आजकल

बढ़ती है दुनिया सवाल से

बजा सिर्फ तुम गाल रहे हो
हर सवाल को टाल रहे हो

जो सवाल पूछे हैं उन से
बैर हृदय में पाल रहे हो

बढ़ती है दुनिया सवाल से
रस्ता अगर निकाल रहे हो

चुना तुझे लोगों ने सेवक
उनको कहाँ संभाल रहे हो

आपस में उलझाने खातिर
रोज फेंक तुम जाल रहे हो

लोगों के सरताज अगर तुम
खुद की भूल खंगाल रहे हो

हरदम मुस्काते काँटों में
बनके सुमन सवाल रहे हो

Sunday, May 8, 2022

पीरितिया! देत दरद घनघोर

पीरितिया! देत दरद घनघोर।
प्रीत जगावत आस मिलन की, हृदय उठत हिलकोर।।
पीरितिया! देत -----

चाह मिलन की, पंख पसारे, वन में नाचत मोर।
पिया निहारत जुग बीतल, कब, मिलिहें चाँद, चकोर।।
पीरितिया! देत -----

खुशी मिलन है, विरह में पीड़ा, आँसू दोनों ओर।
पूर्व मिलन के, बाद विरह के, मौन मचावत शोर।।
पीरितिया! देत -----

मूल जगत का ढाई आखर, प्रेमहिं करें इंजोर।
जस तस मन की बात सुनावत, नहीं सुमन चितचोर।।
पीरितिया! देत -----

Monday, May 2, 2022

साधो! टूटत क्यों परिवार?

साधो! टूटत क्यों परिवार?
कारण क्या है इस टूटन का, करता कौन विचार??
साधो! टूटत -----

स्वाभिमान और अहंकार में, होते भेद महीन।
एक बनावत मन के राजा, लेकिन दूजा दीन।
सुख दुख भी जब इक परिजन के, फिर काहे तकरार??
साधो! टूटत -----

समाधान बातों से मुमकिन, उभरे अगर विवाद।
बहुत जरूरी अपनेपन में, आपस का सम्वाद।
सम्बन्धों का मूल त्याग या, रिश्तों का व्यापार??
साधो! टूटत ----- 

अगर बागबां न्यायपूर्ण हो, बोले मीठे बोल।
तब गुलशन में मिलना संभव, सभी सुमन के मोल।
जीवन चलता सदा प्रेम से, क्यों रूखा व्यवहार??
साधो! टूटत -----

Saturday, April 30, 2022

ईंट स्नेह की जब जुड़े

दीवारें गिरतीं वहाँ, पड़़ती जहाँ दरार।
रिश्ते पड़ी दरार तो, खड़ी हुई दीवार।।

बाहर से परिवार में, दिखे आपसी मेल।
भीतर, भीतरघात के, जारी रहते खेल।।

अहंकार की पालकी, नीचे उतरे कौन?
मुखिया घर का देखकर, अक्सर होता मौन।‌‌।

अपने अपने काम का, करते सभी बखान।
खुद से खुद साबित करे, घर में वही महान।।

रोटी, पानी, वस्त्र संग, बिजली भी भरपूर।
फिर काहे को हो कलह, सबके सब मगरूर।।

ईंट स्नेह की जब जुड़े, तब सजता घर द्वार।
रिश्ते बढ़ते प्यार से, तब सुखमय परिवार।।

एक साथ रह के सुमन, पाले दिल में शूल।
वे परिजन घर तोड़ते, जो गुनाह संग भूल।।
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