Thursday, July 22, 2021

झूठ शर्म से लाल हुआ

भाषण, विज्ञापन में कहते, भारत मालामाल हुआ
हुई झूठ की इतनी बारिश, झूठ शर्म से लाल हुआ

जमाखोर से ज्यादा अब तो, लूट मची है सरकारी
सच को ढंकते यूँ झूठों से, बुरा सत्य का हाल हुआ

लोकतंत्र के मंदिर तक में, झूठ निडरता से बोले 
आमलोग को सुखी बताते, जो सचमुच कंगाल हुआ

तरसे जीवन भर रोटी को, मरने पर भी मान नहीं
झूठ मढ़े पुरखों पे कहकर, ऐसा सालों-साल हुआ

जिसने झूठे ख्वाब दिखाए, वो शोषण अब करे सुमन
पोषण करता जो कुबेर का, जन के लिए कुदाल हुआ

कहाँ गए वो दिन बारिश के?

ऊधम मचाना बस कीचड़ में, और भींगना पानी में।
कहाँ गए वो दिन बारिश के, पढ़ते जिसे कहानी में?

हवा जोर से जहाँ चली तो, दौड़ पड़े हम जंगल को।
चुनने जामुन, आम वहाँ पर, मानो निकले दंगल को।
यूँ बीते दिन बचपन के भी, चढ़ती हुई जवानी में।
कहाँ गए वो दिन -----

मछली खेतों में आती जब, गिरता पानी बारिश का।
छुपाके उसको चुनके लाना, हिस्सा अपनी साज़िश का।
लौटेगी क्या कभी खुशी जो, यादों भरी निशानी में?
कहाँ गए वो दिन -----

तालाबों में खूब उमकना, भले डाँट सुन लेते थे।
खेल, पढ़ाई दोनों को हम, खुशी खुशी चुन लेते थे।
आज सुमन महसूस करे जो, कहना कठिन बयानी में।
कहाँ गए वो दिन -----

मिल के लड़, मायूसी कैसी?

सरकारी मदहोशी कैसी?
अपनों की जासूसी कैसी?

छोड़ विपक्षी, पत्रकार को
मंत्री की सरगोशी कैसी?

सारे स्वतंत्र निकाय देश के
सब में डर, बेहोशी कैसी?

राष्ट्रवाद का नारा जबरन
जनता में खामोशी कैसी?

युवजन में वैचारिक अंधापन
फिर ये कानाफूसी कैसी?

साख देश की जब खतरे में
दिखा रहे मनहूसी कैसी?

डर के आगे जीत सुमन है
मिल के लड़, मायूसी कैसी?

गढ़ता समरस एक समाज

जिसने अपनी सोच संवारा, गढ़ता समरस एक समाज।
करता सबके साथ गुजारा, गढ़ता समरस एक समाज।

धर्मों की दीवार तोड़, जो मानवता को माने।
फिर सवाल पूछे कमियों पर जिसको बेहतर जाने।
करता खुद को नहीं किनारा, गढ़ता समरस एक समाज।
जिसने अपनी सोच -----

चुन लेते ऐसे लोगों को, जो माहौल बिगाड़े।
फिर प्रमाण के साथ उसे वो सबके बीच लताड़े।
खुद को सबके बीच उतारा, गढ़ता समरस एक समाज।
जिसने अपनी सोच -----

आमलोग के हित की चिन्ता, व्यक्तिवाद से दूरी।
आनेवाला कल बेहतर हो, चाहे जो मजबूरी।
बनता इक दिन सुमन सितारा, गढ़ता समरस एक समाज।
जिसने अपनी सोच -----

आँखों के बदलाव समझ

भाषा समझो या न समझो, पर कहने के भाव समझ
इस कारण से आपस में भी, नूतन बढ़े जुड़ाव समझ

होते भाव, अभाव जहाँ भी, प्यार शिथिल होने लगता
भाव-नदी में जितना उतरे, उतना प्रेम-प्रभाव समझ

बहुत कठिन है हर एक बात को, कह पाएं हम होंठों से
कहतीं रहतीं बिन बोले जो, आँखों के बदलाव समझ

आस पास अपने सब देखो, कितने निन्दक भरे पड़े
असल मीत जो निन्दा करके, देते नित्य सुझाव समझ

इक दूजे को जितना समझें, सुमन प्यार उतना बढ़ता
प्रेम भाव बिन इस दुनिया से, अपना तू अलगाव समझ
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