Wednesday, August 26, 2026

वन्देमातरम

राष्ट्रवाद  का   दौर   है  भाई,  बोलो  वन्देमातरम
मंदिर   तक  में   लूट  मचाई,  बोलो  वन्देमातरम 

दिशाहीन जब  होती सत्ता, छात्र उतरते सड़कों पे
रोजी - रोटी   असल   लड़ाई,  बोलो  वन्देमातरम 

चीनी,चावल,आटा, सब्जी, कठिनाई से थाली में 
जब  सुरसा - सी  हो  मँहगाई, बोलो वन्देमातरम 

आमजनों की तकलीफों पे, जो आवाज उठाते हैं 
फेंक  रहे   उन  पर  रोशनाई,  बोलो  वन्देमातरम 

सभी उपक्रम जो सरकारी, अब कुबेर के जिम्मे में 
जन - गण - मंगल पड़ी खटाई, बोलो वन्देमातरम 

बंद  हुए विद्यालय कितने, अनगिन खस्ते हाल में 
नौनिहाल   की   बंद   पढ़ाई,  बोलो  वन्देमातरम 

हँसकर चाहे या रो करके, जगना होगा तुझे सुमन 
अब तक  बात  समझ  न आई, बोलो वन्देमातरम 

भगोड़ा

भागो!
और भागो।
जहाँ तक जी चाहे।
भागते रहो।

भागो! 
जोर जोर से भागो।
कभी घर से,
तो कभी अपनी 
वैयक्तिक जिम्मेवारियों से,
भागो! एक भगोड़े की तरह।

भागो!
एक कायर की तरह,
जीवन के हर सवाल से,
भागो! लगातार भागो!
कभी पड़ोसी से,
कभी सभा से,
तो कभी संसद से,
भागो! खूब भागो।

भागो! 
आखिर कब तक भागोगे?
कहाँ तक भागोगे?
क्या अपने कर्मों से,
कभी भाग सकोगे?

भागो!
पर याद रखो,
तुलसी बाबा कह गए हैं कि
कर्म प्रधान विश्व रचित राखा।
जो जस करहिं सो तस फल चाखा।।

Saturday, February 14, 2026

यादें पुरानी दे दो

रिश्ता   बहुत   पुराना,  यादें   पुरानी  दे  दो
धरती  तरस  रही  है, कुछ तो निशानी दे दो
पिघलो  जरा ऐ  बादल, रोना शुरू करो तुम 
प्यासी  धरा पे सबकी, आँखों में पानी दे दो

अपनी जो है निराशा, किसको दिखा रहे हो
शायद  यही  हताशा, किसको  दिखा रहे हो
अक्सर जो  बोलते  हैं, वो  खाक प्यार करते
ये  प्यार  क्या तमाशा, किसको दिखा रहे हो

पनघट पे  कोई  कैसे, प्यासा  ही  मर रहा है
कितनों  के आसमाँ छत, ऐसा भी घर रहा है
इन्सान  ही  तो  अक्सर, रुख मोड़ते हवा का
जालिम का सर झुका दे, ऐसा भी सर रहा है

बच्चे  बिना  जो  आँगन, सूना  बहुत  लगे हैं
बिन  फूल  जैसे  गुलशन, सूना  बहुत लगे हैं
तालाब,  कुएं  सूखे,  नदियाँ  सिकुड़  रहीं हैं
पानी   बिना  ये  जीवन, सूना  बहुत  लगे  हैं

अपनों  से  हो  जुदाई, रहना  बहुत कठिन है
आँसू  भरे  हैं दिल में, बहना  बहुत कठिन है
रस्मो - रिवाज   कैसे,  सोचे   सुमन  अकेला
बेटी  की  हो  विदाई, सहना  बहुत कठिन है

Thursday, July 10, 2025

खुशी या गम के मिलेंगे आँसू

नजर झुकाना या फिर उठाना, नजर मिलाना लगा हुआ है
मिली  मुहब्बत  में जो निशानी, वहीं निशाना लगा हुआ है

भले  हो  मेरा  या  घर तुम्हारा, सभी घरों की यही कहानी 
कसक मुहब्बत की जो है बाकी, उसे सुनाना लगा हुआ है 

चला  मुहब्बत के रास्ते जो, खुशी या गम के मिलेंगे आँसू
अगर किसीको जखम मिला तो, उसे छुपाना लगा हुआ है

बढ़ी  जो  दुनिया  है  रोज आगे, सदा मुहब्बत के रास्ते ही
मगर अभी नफरतों के शोले, से घर  जलाना लगा हुआ है 

सुमन  मुहब्बत  के ही सहारे, बचा ले पीढ़ी जो आनेवाली 
हमें  मिला  है  जो  पूर्वजों  से, उसे  सजाना  लगा हुआ है

Tuesday, July 1, 2025

डरे वो भीतर से

ये सबको  है  एहसास, डरे  वो  भीतर से।
सत्ता  की  जिसे  तलाश, डरे वो भीतर से।।

जीवन जीने का सपना, सुख-दुख है सबका अपना। 
सुख  की  चर्चा  से दूरी, बस केवल दुख को जपना।
महफिल में बनते खास, डरे वो भीतर से।।
सत्ता की जिसे -----

जिसको  भी  गले  लगाते, उसके घर आग जलाते। 
जिसने  भी  चाहा  इनको, अब  रो-रोकर पछताते। 
दिखते मन के ऐय्याश, डरे वो भीतर से।।
सत्ता की जिसे -----

वो  जाते  जहाँ  वहीं  के, पर  दर्शन  करे  मही के।
जब  कालचक्र  घूमे  तो, फिर  होते  नहीं कहीं के।
ये सुमन को है विश्वास, डरे वो भीतर से।।
सत्ता की जिसे -----
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