Saturday, October 29, 2022

कविताओं को मरते देखा

बड़ी बड़ी महफिल में जाना, अपनी कविता वहाँ सुनाना।
लिखा आपने जो शिद्दत से,मिला उसे क्या सही ठिकाना?
नामचीन कवियों को अक्सर, आयोजक से डरते देखा।
बड़े बड़े मंचों पर अच्छी, कविताओं को मरते देखा।।

मुझे बुलाओगे फिर मैं तुझको, अपने शहर बुलाऊँगा।
मेरी पीठ खुजाना प्यारे, मैं तेरी खुजलाऊँगा।
व्यापारिक रस्ते से कवि को, प्राय: रोज गुजरते देखा।
बड़े बड़े मंचों पर -----

मंचों पर हस्ती से ज्यादा मान तुझे समुचित दूँगा।
करके हल्का अपना लिफाफा, दान तुझे निश्चित दूँगा।
कुछ कवि को अपने स्तर से, नीचे यार उतरते देखा।
बड़े बड़े मंचों पर -----

है समाज को अगर बचाना, फिर साहित्य बचाओ तुम।
रचा बसा तेरी प्रतिभा में, वो आदित्य बचाओ तुम।
शब्द साधना करे सुमन जो, उनको यहाँ निखरते देखा।
बड़े बड़े मंचों पर -----

खुद का घर मंदिर बने

अलग अलग इन्सान सा, भगवानों के रूप।
सरदी, गरमी साथ में, बारिश, छाया, धूप।।

इक दूजे से हम कहें, कण कण में भगवान।
जो कहते, क्या अब तलक, बन पाया इन्सान??

चलता जीवन प्रेम से, प्रेम जगत में खास।
भाव शून्यता में सदा, भगवन दिखे उदास।।

माँगे सब भगवान से, हो करके मजबूर।
हम सबमें भगवान जब, खोज रहे क्यों दूर??

विवश लोग अक्सर करे, भगवानों को याद।
तू खुद ही भगवान है, खुद से कर सम्वाद।।

कदम कदम पर हैं सजे, भगवन के घर द्वार।
खुद का घर मंदिर बने, हो परिजन में प्यार।।

आदम ही भगवान है, भला बता क्या फर्क?
नहीं सुमन अन्तर दिखे, लाख गढ़ो तुम तर्क।।

Monday, September 26, 2022

पानी तक भी मीठा, खारा हे भगवन्

तू संकट का एक सहारा हे भगवन्
पूजे तुझको ये जग सारा हे भगवन्

भवसागर की उलझन में डूबे, उतरे
तू ही सबको करे किनारा हे भगवन्

दुख में सहयोगी अनजाने बनते जब
उनमें दिखता रूप तुम्हारा हे भगवन्

मैं, मेरा में निशि दिन हम सब लगे हुए
लेकिन कुछ भी नहीं हमारा हे भगवन्

बड़ी बड़ी बाधाएं भी टल जातीं हैं
श्रद्धा से जब नाम पुकारा हे भगवन्

चंदा, सूरज, पर्वत कितने रूप तेरे
पानी तक भी मीठा, खारा हे भगवन्

लाखों झटके खा करके इस जीवन में
सुमन करे दिल से जयकारा हे भगवन्

दाग तेरे दस्ताने में

आस लगाकर परिजन बैठे, नित जिनके सिरहाने में
लेकिन सब दिन वही शाम को, जा पहुँचे मयखाने में 

अलग अलग रिश्तों में होते, रूप प्यार के अलग अलग
जरा फर्क करना भी सीखो, प्रीतम और दीवाने में 

चालाकी से चुपके चुपके, शोहरत लाख करो हासिल
इक न इक दिन दिख जाएगा, दाग तेरे दस्ताने में

किसे पता कि कल क्या होगा, अरज रहे पीढ़ी खातिर
भला देर क्या लगती यारों, दौलत आने जाने में

कहीं सहारा अपनों जैसा, गर्दिश के दिन मिल जाता 
देर लगे हैं तब क्या अपनी, आँखों को बरसाने में

कण कण में भगवान का डेरा, सिखा रहे जो लोगों को
जरा सोचना वही लोग क्यों, बैठे नित बुतखाने में 

देख सुमन सबके जीवन की, अपनी अपनी गुत्थी है 
लगे रहो बस तन मन धन से, इसको ही सुलझाने में

स्थायी विपक्ष

"राग-दरबारी" मैं नहीं जानता
और न ही कभी गाता हूँ।
इसीलिए किसी भी शासक को
कभी नहीं भाता हूँ।

हाँ! प्यारे भाइयों और बहनों,
मैं हमेशा फूलों के पक्ष में हूँ।
इसका मतलब ये कत्तई नहीं कि
मैं डालियों, पत्तों के विपक्ष में हूँ।

सामाजिक पक्षधरता,
एक जीवंत कलमकार की मजबूरी है।
इसीलिए सत्ता पक्ष से सदा,
उनकी बनी रहती दूरी है।

मैं सभी युधिष्ठिरों के सामने
अपना जिन्दा सवाल रखूंगा,
क्योंकि मैं युगों युगों का यक्ष हूँ।
बेहतर समाज निर्माण के लिए,
हर काल खण्ड में सुमन,
हर सत्ता के सामने, मैं स्थायी विपक्ष।
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