Saturday, July 30, 2022

धरती का श्रृंगार

झूमर, कजरी लिख दिया,  कुछ सावन के गीत। 
गाऊँ जिसके साथ मैं,  मिला नहीं  वो मीत।। 

प्रीतम बादल से मिलन, चाह धरा की खास।
तब रोता बादल जहाँ, जगी धरा की प्यास।।

बीज अंकुरित हो रहे, देख धरा का प्यार।
हरियाली ने कर दिया, धरती का श्रृंगार।।

प्रेम सृजन का मूल है, सृजन धरा का काज।
वर्षा है रानी अगर, है वसंत ऋतुराज।।

सावन, फागुन में सुमन, पिया मिलन की आस।
सावन में बारिश हुई, फागुन है मधुमास।।

शब्द नर्तकी उलट के देखो

जी कर जीवन-संघर्षों में, नव-जीवन बन जाता है।
शब्द नर्तकी उलट के देखो, वो कीर्तन बन जाता है।

जंगल, पर्वत, धरती, नदियाँ और समन्दर का पानी।
सज्जन-दुर्जन, मूरख के सँग अक्सर मिलते हैं ज्ञानी।
इक सीमा में जीना मरना, वही वतन बन जाता है।
शब्द नर्तकी उलट के देखो ----------

जीवन से लड़ना है जिसको, उसने रोना छोड़ दिया।
जिसके दिल में सोना चाहत, उसने सोना छोड़ दिया।
चिन्तन नेक अगर अंधे का, वही नयन बन जाता है।
शब्द नर्तकी उलट के देखो ----------

कर्मों से क्यों नीचे जाना, है चढ़ने को सीढ़ी भी।
वर्तमान के साथ बचाना, हमको अगली पीढ़ी भी।
दर्द चुभन का सहकर खिलता, वही सुमन बन जाता है।शब्द नर्तकी उलट के देखो ----------

वक्त पे जिसने वक्त को जाना

वक्त पे तुम जो आए होते, शायद नहीं पराए होते!
बुरे वक्त के साथी सँग हम, गीत खुशी के गाए होते!!

जीवन सबका होता अपना, जिसमें अपनापन है सपना।
काम वक्त पे जो ना आए, उन रिश्तों को काहे जपना?
तनिक सहारा मिलने पर हम, दुख में भी मुस्काए होते!
बुरे वक्त के साथी -----

वक्त मिला जो वही वक्त है, जो कोमल भी कहीं सख्त है।
वक्त पे जिसने वक्त को जाना, वक्त दिलाता उसे तख्त है।
हाथ बढ़ाते वक्त पे तुम तो, तुमसे हाथ मिलाए होते!
बुरे वक्त के साथी -----

आस पास में जो भी गम है, ऑंखें देखो अक्सर नम है।
झाँक सुमन तू नीचे अपने, तेरा गम कितनों से कम है।
इक इक हम तुम मिलके ग्यारह, अपने कदम बढ़ाए होते!
बुरे वक्त के साथी -----

सबसे बड़ो समाज हमेशा

अपने अपने तर्क सभी के, खोने, पाने के होते
जैसे दाँत अलग खाने के, और दिखाने के होते

जिन आँखों से सूखा पानी, उनकी दुनिया बेमानी 
बचा के रख ले वो पानी जो, नहीं बहाने के होते 

बच्चे को भी रोने पर ही, अक्सर खाना मिलता है
सबको रोटी पाने का हक, सभी जमाने के होते

उस माटी की सेवा में हम, जहाँ पे हमने जन्म लिया 
मगर देशभक्ति अब है जो, उनके माने के होते

सबसे बड़ो समाज हमेशा, नहीं भूलना कभी सुमन 
लोक जागरण जिस समाज में, वही ठिकाने के होते

Friday, July 1, 2022

तोता बदल दिया

झटके में बंद करके, टाका बदल दिया
फेरे के वक्त जैसे, दुल्हा बदल दिया 

कानून से भी ऊपर, शासक जहाँ दिखे 
उस देश ने इन्साफ का, रस्ता बदल दिया 

राजा की जी हुजूरी, तोता किया करे
बदला किसी ने रुख तो, तोता बदल दिया

शहनाई शासकों की, श्मशान में बजती
पूछा जो प्रश्न उसने, बाजा बदल दिया

राजा को वो खटकते, जो सवाल करे है
बदला नहीं सुमन तो, कांटा बदल दिया
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