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Tuesday, April 28, 2020

मत बनियो अभिमानी

साधो! घर घर यही कहानी।
वो  अपनी  प्यारी  सी दुनिया, लगती  क्यूँ  वीरानी??
साधो ! घर घर -----

हम  सबने  कुदरत  से भरसक, अपनी की मनमानी।
जब  कुदरत  नाराज  हुई  तो,  याद  दिलाती  नानी।।
साधो ! घर घर -----

दुनिया  में  अनगिन  जीवों की, मिटती रही निशानी।
जिनसे  हम  सबने  स्वारथ  में, जी भर की बेईमानी।।
साधो ! घर घर ----

हाल  जगत  का   सुधरे   कैसे,  लगे   हुए   विज्ञानी।
सुमन कभी कुदरत के आगे, मत बनियो अभिमानी।।
साधो ! घर घर -----

Sunday, April 12, 2020

साधो! घर में बंद रहो ना

साधो! घर में बंद रहो ना।
सबको डसने को आतुर है डगर डगर कोरोना।।
साधो! घर में -----

रक्तबीज सा ये दुनिया में, फैला कोना कोना।
है इलाज आपस की दूरी, खुद को साफ रखो ना।।
साधो! घर में -----

लाखों जानें गयीं हैं देखो आगे क्या क्या होना?
अगर नियम से नहीं चले तो शेष बचेगा रोना।।
साधो! घर में -----

नियम मानकर जितना संभव वो सहयोग करो ना।
इस विपदा में सभी सुमन मिल रस्ता एक चलो ना।।
साधो! घर में -----

Thursday, February 13, 2020

साहिब! अब तो करो विचार

साहिब! अब तो करो विचार।
धीरे धीरे खिसक रही क्यों हाथों से सरकार।।
साहिब! अब  -----

जितने तेरे आज समर्थक, व्यर्थ करे तकरार।
जो सवाल करते उसको झट, कहते क्यों गद्दार।।
 साहिब! अब  -----

लोगों ने कुछ आस लगाकर दिया आपको प्यार।
पर देखो शासन की हालत, लोकतंत्र बीमार।
साहिब! अब  -----

बेहतर हो परिवेश हमारा, विनती बारम्बार।
राह दिखाए कलम सुमन जो मत देना दुत्कार।।
साहिब! अब  -----

तब डर लगता है

समाचार  जब  झूठ परोसे,
मानो सब कुछ राम भरोसे,
घर  वाला भी  घर  के  होते  बेघर लगता है।
ऐसे  जब  हालात  सामने  तब डर लगता है।।

कहीं  गरजते, कहीं  बरसते, पानी तक को लोग तरसते।
तल्ख व्यवस्था जहां सामने, चुपके चुपके लोग सिसकते।
बहुत गरम शासक का जब जब तेवर लगता है।
ऐसे जब हालात सामने -----

कहीं  कहीं  पर नौकरशाही और कहीं पर अफसरशाही।
कभी - कभी  तो  लोकतंत्र में, दिखने लगती तानाशाही।
हथकड़ियां  सोने  की किसको ज़ेवर लगता हैॽ
ऐसे जब हालात सामने -----

अपने - अपने  पिंजड़े सबके, उसी सोच में उबके-डुबके।
कुछ तो खुशियां मना रहे पर सुमन करोड़ों अन्दर सुबके।
जब शासक  का  तला  करैला घेवर लगता है।
ऐसे जब हालात सामने -----

Wednesday, January 22, 2020

सोया हिन्दुस्तान नहीं

करो सियासत पर तल्खी का, है कोई स्थान नहीं।
लोकतंत्र में जाग रहे सब, सोया हिन्दुस्तान नहीं।।

चुना आपको पांच बरस तक, आप अभी  के आका हो।
तब  तो ये कर्तव्य आपका, किसी  के घर ना फाका हो।
कहीं कमी तो सुन लोगों की, आप करो अभिमान नहीं।।
लोकतंत्र में जाग रहे -----

सभी  दलों  ने  सत्ता  पायी, प्रायः सबका  मान  हुआ।
दिन बहुरे  केवल शासक के, लोगों का नुकसान हुआ।
कभी  नहीं  शासक  ये  सोचे, और कोई विद्वान नहीं।।
लोकतंत्र में जाग रहे -----

जनमत  से  सहमत  होकर ही, लोकतंत्र चल पाता है।
लोगों  का  रक्षक जो शासक, तक्षक बन डंस जाता है।
क्यों पलाश  का सुमन बने हो, होगा शेष निशान नहीं।।
लोकतंत्र में जाग रहे -----

Tuesday, January 14, 2020

विरोधी चुप रहना

मत ज्यादा कर तकरार, विरोधी चुप रहना।
जबतक हमरी सरकार, विरोधी चुप रहना।।

ये  तर्क  नया गढ़ लाते हैं, फिर बेफजूल बतियाते हैं।
पुरखों का दोष गिना करके, मनमर्जी राज चलाते हैं।
खुद घोषित चौकीदार, विरोधी चुप रहना।
जबतक हमरी सरकार----

जिस नौजवान से ताकत है, अब उनपे ही तो आफत है।
सड़कों  पे  चीख  रहे बच्चे, पर नहीं कहीं कुछ राहत है।
सच कहता क्या अखबार, विरोधी चुप रहना।
जबतक हमरी सरकार-----

वो जुल्म करें जी भर भरके, हक लेंगे हम भी लड़ लड़के।
कर देती जनता न्याय सुमन, नामुमकिन जीना डर डरके।
ये खुद वकील, मुख्तार, विरोधी चुप रहना।
जबतक हमरी सरकार -----

Saturday, December 14, 2019

संख्या-बल से डरा रहे होॽ

कोई  नहीं किया वो करते,
लोक-लाज से भी न डरते,
मदहोशी  में देश के भीतर,
नया खेल नित करा रहे हो।
संख्या-बल से डरा रहे होॽ?

          हमने    तुमको   दी  है  गद्दी,
          बढ़ी    तेरी   सीमा  - चौहद्दी,
          मूर्ख बनाकर उस जनता को,
          यहाँ - वहाँ  तुम  चरा  रहे हो।
          संख्या-बल  से  डरा  रहे होॽ

नोच  रहे तुम उनकी बोटी,
जिन्हें  जरूरत  पहले रोटी,
पर उसके  बदले  वादों की,
क्यों लालीपाॅप धरा रहे हो?
संख्या-बल  से डरा रहे होॽ

          मिल जुलकर हम  रहते आए,
          साथ सुमन के सुख-दुख गाए,
          भाई - भाई   को  साजिश  से,
          आपस  में  नित  लड़ा  रहे हो?
          संख्या-बल  से   डरा  रहे  होॽ

Wednesday, November 6, 2019

अरे रे रे बाबा ना बाबा

अभी मंदा है व्यापार, अरे रे रे बाबा ना बाबा
मस्ती में है सरकार, अरे रे रे बाबा ना बाबा

जितने भी तेरे वादे थे, कुछ झूठे तो कुछ आधे थे
लोगों ने जिसको सच माना, क्योंकि वो सीधे साधे थे
मत और करो लाचार, अरे रे रे बाबा ना बाबा
मस्ती में है सरकार-----

तुम लोगों को भरमाते हो और ताकत पे इतराते हो
जो भी विरोध तेरा करता तुम जेल उसे भिजवाते हो
क्या उचित है अत्याचार, अरे रे रे बाबा ना बाबा
मस्ती में है सरकार-----

ऐ भारतवासी अब जागो, कर्त्तव्य छोड़कर मत भागो
हक पाने को लड़ना होगा, तू व्यर्थ में जीवन मत त्यागो
फिर मांग सुमन अधिकार, अरे रे रे बाबा ना बाबा
मस्ती में है सरकार-----

Monday, September 2, 2019

साधो! बनियो मत नादान

साधो! बनियो मत नादान। 
सभी मीडिया बाँट रहे हैं अब सरकारी ज्ञान।। 
साधो! बनियो -----

तुम दिखलाते हिन्दू मुस्लिम, हम खोजें इनसान। 
बेबस चेहरों पर दिखलाते प्रयोजित मुस्कान।। 
साधो! बनियो -----

क्या सच्चाई देश के भीतर, आमलोग अनजान। 
पेट सभी के भरनेवाले, भूखे मरे किसान।।
साधो! बनियो -----

क्या तेरा कर्तव्य मीडिया, कैसी छेड़ी तान। 
सुन सुन सत्ता-गान हमेशा, पके सुमन के कान।। 
साधो! बनियो -----

Monday, July 29, 2019

हमारे आँगन में

यूँ बढ़ा आपसी प्यार, हमारे आँगन में।
नित होती अब तकरार, हमारे आँगन में।।

है बात कोई समझाना, दो प्यार के बोल सुनाएं।
तुम गला दबा समझाओ, हम प्यार से गले लगाएं।
क्यूँ बाँट रहे दुत्कार, हमारे आँगन में।
नित होती अब -----

तू समाचार के चेहरे, हमरी बातों पे पहरे।
तुम रोज हमें दिखलाते, क्यूँ झूठे ख्वाब सुनहरे?
क्या उचित यही व्यवहार, हमारे आँगन में
नित होती अब -----

जो जीते जी हैं मरते, वो मरने से नहीं डरते।
है वक्त सुमन सहलाओ, कुछ बेहतर क्यूँ नहीं करते?
क्या मुखिया ही बीमार, हमारे आँगन में।
नित होती अब -----

Wednesday, July 10, 2019

खोल पंख फिर उड़ो गगन में

अपना अपना सपना देखो
उन सपनों में अपना देखो
तुझे सजन मिलना मुमकिन तब
सदा खोज तू उसे स्वजन में
खोल पंख फिर उड़ो गगन में

अपने अपने फर्ज हमारे
फर्ज सभी हैं कर्ज हमारे
खोजो साथी अपने जैसा
वरना जलते रहो अगन में
खोल पंख फिर उड़ो गगन में

जैसा जीते वैसा लिखना
जो अन्दर तुम बाहर दिखना
भला जगत का कैसे संभव
वक्त गुजारो सदा मनन में
खोल पंख फिर उड़ो गगन में

जीवन काल हमारा छोटा
वक्त कभी ना करना खोटा
जनम सुमन का इस माटी से
खोना फिर से इसी वतन में
खोल पंख फिर उड़ो गगन में 

Sunday, June 9, 2019

शिक्षा एक अंजूरी दे दो

कुछ करना है देश की खातिर,
जीना मरना देश की खातिर,
दो माटी का ढेला हमको या फिर तुम कस्तूरी दे दो।
एक गुजारिश है दिल्ली से हर हाथों को मजूरी दे दो।।

मानव श्रम और संसाधन सँग उर्जा है भरमार यहाँ।
कहीं नशेड़ी, आतंकी सँग जुड़ते जो बेकार यहाँ।
रोटी, पानी सभी का हक है, कम से कम वो पूरी दे दो।
एक गुजारिश है दिल्ली से -----

शिक्षक खाना खिला रहे हैं सरकारी स्कूलों में।
नौनिहाल शिक्षा से वंचित इन सरकारी भूलों में।
नहीं बहुत तो जीने खातिर शिक्षा एक अंजूरी दे दो।
एक गुजारिश है दिल्ली से -----

नौजवान का देश है भारत तुम कहते हो मंचों से।
लेकिन वे जीते हैं कैसे पूछ सुमन सरपंचों से।
सबके जीवन के पहिये को चलने खातिर धूरी दे दो।
एक गुजारिश है दिल्ली से -----

Wednesday, May 15, 2019

साधो! डूब रही है नाव

साधो! डूब रही है नाव। 
इस  कारण  से  तल्ख  हुआ  है, तेरा नित बरताव।। 
साधो! डूब  -----

नहीं  देखना  पड़ता  ये  दिन, सुनते अगर  सुझाव। 
प्रतिद्वंदी  को   माना   दुश्मन,  करते   रहे  बचाव।। 
साधो! डूब -----

क्या लिखना, क्या खाना हमको, देते व्यर्थ दबाव। 
हम सब  साथ रहे सदियों से, करते क्यों अलगाव।। 
साधो! डूब -----

उनकी  भी  बातें  सुन  लेना, भोगे  रोज अभाव। 
कभी नहीं मंजूर सुमन को, आपस का बिखराव।। 
साधो! डूब -----

Tuesday, March 19, 2019

भटके को आईना दिखाने की भूख है

छपने  की  भूख  न  छपाने की भूख है
भटके  को  आईना दिखाने की भूख है

कौन  यहाँ  सुनता है, आज सभी बोले
अपनी खुशी, गम का राज भी न खोले
पहले   से   देश   में   प्रदूषित   हवा  है
ऊपर   से   बोल  के  जहर  और  घोले
बेबस  को  इनकी   दबाने  की  भूख है
भटके को आईना -----

वादे   वो   करके   जगाते    हैं  आशा
सबके  दिलों  में  क्यों   छायी  निराशा
पक्ष या विपक्ष पहले शिष्ट थे विरोध में
फिर क्यों चलन आज गाली की भाषा
शोर करके आँकड़े छुपाने  की भूख है
भटके को आईना -----

सच   में  न झूठ  का  पुलिन्दा  रहेगा
सच्चे    से    झूठा    शर्मिन्दा   रहेगा
लाखों   शहीदों   ने  देश  जो  बनाया
लोकतंत्र   हर    हाल   जिन्दा   रहेगा
खुशबू  सुमन  की फैलाने की भूख है
भटके को आईना -----

तू हर पल हमें निखारती

नहीं किसी को ज्यादा, कम।
खुशियाँ  बाँटें तुम और हम।।
यही ज्ञान की असल में पूजा, यही ज्ञान की आरती।
माँ भारती! तू हर पल हमें निखारती।।

धन दौलत जितना हो जाए, बिना ज्ञान बेकार सदा।
इस  कारण  से  ऐसे  घर  में, होती  है तकरार सदा।
जहाँ  गन्दगी  बढ़  जाती  माँ, अक्सर  उसे बुहारती।
माँ भारती -----

घूम रहे कुछ मतवाले बन यहाँ, वहाँ और इधर, उधर।
ऐसे  भटके  लोगों  को  भी, दिखलाती हो सही डगर।
अपनी   सन्तानों   को   तेरी,  नजरें   सदा  निहारती।
माँ भारती -----

खर्च  करो  तो धन जितने हैं, यारों अक्सर घट जाते।
मगर  खजाना  तेरा ऐसा, खर्च  करो  तो  बढ़  जाते।
सुमन चढ़ाता सुमन चरण में, जब जब उसे पुकारती।
माँ भारती -----

कहाँ गगन में चले गए

सोच नहीं पाए हम जितना
तुमसे प्यार मिला था उतना
छोड़ सभी को कहाँ अचानक किस निर्जन में चले गए?
सूख गए आँखों के आँसू उतर के मन में चले गए।।

कोशिश थी पूरा करने की जो जो तुमसे काम मिला
बड़े फक्र से दुहराया कि भाई हमको राम मिला
फिर किस कारण छोड़ धरा को कहाँ गगन में चले गए?
सूख गए आँखों के ----

प्रेम, दया, करुणा की मूरत बन के जग को दिखलाया
हर उल्टे परिवेश में तुमने लड़ना हमको सिखलाया
खोज रहे स्वारथ से तुमको कौन भवन में चले गए?
सूख गए आँखों के -------

एक दिन तो जाना है सबको चले गए कोई बात नहीं
तुझे भुलाना क्या मुमकिन है वैसे भी जज्बात नहीं
बिखराने कर्मों की खुशबू सभी सुमन में चले गए
सूख गए आँखों के -----

किसी तरह कवितायी कर

काव्य नाम पे कुछ भी कर
समाचार  की उल्टी कर

पक्ष छोड़कर, गाली दे
जी भर पानी पी पी कर

सत्ता की गोदी में जा
सच की वाणी को सी कर

छन्द ज्ञान से क्या मतलब
किसी तरह कवितायी कर

कवियों का ये हाल सुमन
सर की रोज धुनायी कर 

Saturday, December 1, 2018

दोषी पिछली सरकार

अब सुन सुन के बीमार, दोषी पिछली सरकार।
क्यों घर - घर भ्रष्टाचार, दोषी  पिछली सरकार।।

शासन  अच्छे से कहाँ हुआ, केवल भाषण ही यहाँ हुआ।
आपस की मिल्लत तोड़े जो, कहते अनुशासन यहाँ हुआ।
नित बढ़ती क्यों तकरार, दोषी पिछली सरकार।।

ये  धरम तो एक बहाना है, गद्दी पर लगा निशाना है।
जब राजनीति बहती गंगा, अवसर पे खूब नहाना है।
क्यों आमलोग लाचार, दोषी पिछली सरकार।।

पहले था शासक पढ़ा हुआ, अब समाचार भी गढ़ा हुआ।
बच्चे  तक  नहीं सुरक्षित हैं, अपराधी  का मन बढ़ा हुआ।
महिला पर अत्याचार, दोषी पिछली सरकार।।

शासक  विदेश  जब  जाते हैं, चर्चा विशेष ही पाते हैं।
पूरी दुनिया तो घूम लिया, क्या नव-निवेश ला पाते हैं?
क्यों मंदा है व्यापार, दोषी पिछली सरकार।।

सब भीतर भीतर घायल है, सबके होंठों पे साँकल है।
इस हालत में जीना कैसे, ये सोच सुमन भी पागल है।
हैं नौजवान बेकार, दोषी पिछली सरकार।।

अभी क्यों दिखते रूप अनेक?

राम तुझे जितना भी समझा, कर्म तुम्हारे नेक।
प्रजा और सम्बन्धी खातिर, न्याय तुम्हारा एक।
अभी क्यों दिखते रूप अनेक?

तुम मेरे, शिव सैनिक कहते, वी एच पी के संगी।
और भाजपा अपना कहते, ऐसा ही बजरंगी।
लेकिन राम सभी के तुम हो, दे दो इन्हें विवेक।
अभी क्यों दिखते रूप अनेक?

बेबस दिखते राम अभी

राजनीति के रखवालों ने किया है ऐसा काम अभी।
निर्बल के बल राम सुना पर बेबस दिखते राम अभी।।

राम बसे हैं घर घर यारों, यह सदियों का नाता है।
रामायण की गाथा में वो, सबका भाग्य विधाता है।
उनके घर के कारण घायल हुआ अयोध्या धाम अभी।
निर्बल के बल राम सुना ----------

जी कर राम सिखाते हमको, क्या होता भाईचारा।
लेकिन नाम, राम का लेकर, भाई को भाई मारा।
हर चुनाव में जीत की खातिर, राम बना आयाम अभी।
निर्बल के बल राम सुना ----------

अपनाते हैं राम उसी को, जो भी उपेक्षित हैं सारे।
सुमन उपेक्षित आज किनारे, वो भी विपदा के मारे।
बचा राम तू मर्यादा को, करो नहीं विश्राम अभी।
निर्बल के बल राम सुना ----------
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