साधो! घर घर यही कहानी।
वो अपनी प्यारी सी दुनिया, लगती क्यूँ वीरानी??
साधो ! घर घर -----
हम सबने कुदरत से भरसक, अपनी की मनमानी।
जब कुदरत नाराज हुई तो, याद दिलाती नानी।।
साधो ! घर घर -----
दुनिया में अनगिन जीवों की, मिटती रही निशानी।
जिनसे हम सबने स्वारथ में, जी भर की बेईमानी।।
साधो ! घर घर ----
हाल जगत का सुधरे कैसे, लगे हुए विज्ञानी।
सुमन कभी कुदरत के आगे, मत बनियो अभिमानी।।
साधो ! घर घर -----
