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Tuesday, April 28, 2020

संक्रमण

मौत हो या जिन्दगी,
गम हो या खुशी,
सबकी अपनी अपनी तैयारी है
फिर भी संक्रमण जारी है।
और भारत में सियासी संक्रमण?
ये तो कोरोना पर भी भारी है।।

Sunday, April 12, 2020

ये दुनिया कितनी अजीब है?

साथ साथ रहकर भी अक्सर
हर एक, दूसरे का रकीब है।
जिसे समझना बहुत कठिन है,
सचमुच! ये दुनिया कितनी अजीब है?

स्वार्थ है, परमार्थ है
हमारे हर काम का विशेषार्थ है।
इसे विवेचनार्थ जब सोचता हूँ
तो पाता हूँ कि प्रत्यक्षतः
स्वार्थ तो अक्सर जीवन के
साथ ही दिखता है और
परमार्थ! जीवन के बाद भी
साथ साथ टिकता है।
परमार्थ सदा सम्पन्न है
और स्वार्थ कितना गरीब है?
सचमुच! ये दुनिया कितनी अजीब है?

ज्ञान है, अज्ञान है,
हर विधा का अपना विज्ञान है,
जिस पर कुछ का ध्यान है तो
कितनों के लिए यह सिर्फ अनुमान है।
जरूरत के हिसाब से उसका
जब लेता हूँ संज्ञान तो पाता हूँ कि
ज्ञान सदा ही साथ में टिकता है
और अज्ञान! दिन रात
ज्ञान के नाम से बिकता है।
जबकि ध्यान से सोचो तो
ज्ञान और अज्ञान बिल्कुल करीब है।
सचमुच! ये दुनिया कितनी अजीब है?

धर्म है, अधर्म है,
सबका अपना अपना कर्म है
कोई कहता कुकर्म है तो
कोई, उसे ही कहता सुकर्म है।
इसके मर्म पर जब नर्म होकर
विचार करता हूँ तो पाता हूँ कि
धर्म की ओट में अधर्म बिकता है
और हमारे कर्मों का फल
हमारे जीवन में साफ साफ दिखता है।
सब कहते कि हमारे कर्म से ही
बनता हम सबका नसीब है।
सचमुच! दुनिया कितनी अजीब है?

Wednesday, April 8, 2020

मोम

मैं बार बार तपता हूँ,
पिघलता हूँ और एकबार 
फिर से तैयार हो जाता हूँ
पुनः तपने और पिघलने के लिए।

मैं हमेशा चाहता हूँ
तुझे बचाना ताकि मुझे
तेरा सान्निध्य मिलता रहे बारम्बार।

ऐ बाती ! क्या तुझे एहसास हैॽ
कि मोम बार बार तपता है,
पिघलता है फिर तैयार हो जाता है
तुम्हारे साथ चलने को, जलने को,
ठीक मेरी और तुम्हारी तरह।

Thursday, February 13, 2020

मैं तुम्हारी नींव का पत्थर हूं

कल जैसा था आज उससे बदतर हूं।
जबकि मैं तुम्हारी नींव का पत्थर हूं।

मैं कमाता हूं तुम खाते हो,
मेरी बदनसीबी के गीत गाते हो,
तुम्हारे बच्चे पढ़ते हैं
और मेरे बच्चेॽ
तुम्हारे बच्चों की खुशी के लिए
नये नये खिलौने गढ़ते हैं।
फिर तुम ही साबित क्यों करते कि
मैं तुमसे कमतर हूं।
जबकि मैं तुम्हारी नींव का पत्थर हूं।।

मेरा वोट, मुझे ही चोटॽ
तेरे मन में देखा हमेशा ही खोट,
मेरे घर में फाकाकशी,
और तेरे घर में नोट ही नोट।
तुम चमकते हो, और चमको
पर मत भूलो कि मैं अहंकार का कातिल
और विनम्रता का रहबर हूं।
क्योंकि मैं तुम्हारी नींव का पत्थर हूं।

Tuesday, January 14, 2020

सख्ती से सच पे पहरा है

आवाज   दबाने  की  कोशिश।
जनतंत्र   मिटाने  की  कोशिश।

स्तब्ध   हुआ   मन  आहत  है।
ऐसी   क्यों   हुई  सियासत  हैॽ

ये  जख्म  बहुत  ही  गहरा  है।
सख्ती   से   सच   पे  पहरा है।

घुट -घुटके फिर है जीना क्योंॽ
नित जहर गमों का पीना क्योंॽ

मत  सोच कि हम डर जाएंगे।
हक   लेंगे   या   मर   जाएंगे।

सब दिन  गद्दी पर कौन यहाँॽ
हम भला  रहें क्यों मौन यहाँ।

तू  जाग  सुमन  कर  देर नहीं।
सह  सकते  और  अंधेर  नहीं।

Saturday, January 4, 2020

गद्दार

किसी ने दुनिया को
दो भागों में बांटा
पुरूष और नारी
तो किसी ने कहा
गरीब और अमीर

भारत भी अभी दो भागों में बंटा है
सबका निजी विचार है
परिभाषा बदलने का अधिकार है
जो सत्ता के साथ है वो देशभक्त
बाकी सब गद्दार है।

Saturday, December 14, 2019

वह तीसरा कौन हैॽ

एक गवाह जुटाता है,
दूसरा गवाह से पूछता है,
लेकिन आजकल दोनों,
एक दूसरे को कूटता है,
वहीं तीसरा भी है
जो अन्दर ही अन्दर
दोनों को लूटता है।
वह तीसरा कौन हैॽ
इस बात पर लगभग,
पूरा देश मौन है।

नोट - अग्रज धूमिल जी से मुआफी की अपील के साथ

Sunday, October 13, 2019

त्वरित न्याय का पैगाम

शिक्षक पढ़ा रहे थे  व्याकरण,
प्रश्न पूछा गया बताओ
समूहवाचक संज्ञा के उदाहरण,
उत्तर मिला - सभा, भीड़
सभा! अर्थात्
एक नेतृत्व और एक उद्देश्य।
लेकिन भीड़ !
यानि कोई नेतृत्व नहीं और
अलग अलग सबका ध्येय।

मगर हकीकत से हटकर
जब से सिर्फ भाषण में
हुआ है विकास का अवतरण
तब से पूरी तरह बदल गया है
सभा और भीड़ का समीकरण।
जिसके साथ ही बदल गया
हमारा सामाजिक व्याकरण।।

अब सभा को ना तो
एक नेतृत्व मिल पाता और
ना ही रह गया एक लक्ष्य का उपाय
लेकिन भीड़ ने शुरू किया एक नेतृत्व
और एक लक्ष्य का नूतन अध्याय।
इसलिए शायद अब भीड़,
करने लगी है त्वरित न्याय।

मुजरिम बनाना, पक्ष में दलील देना,
फैसला सुनाना और तत्काल सजा देना,
ये सारे रह गए हैं भीड़ के अब काम।
जिससे मुमकिन है मिले,
हमारी न्यायिक प्रक्रिया को
त्वरित न्याय करने का नया पैगाम।

सम्भव हो तो इसे तत्काल
अपनाने की जरूरत है,
और इसके लिए भला इससे
अच्छा कौन सा मुहूरत है?
जब लोग मुट्ठी बाँधने के बजाय
स्वतः मुट्ठी खोल रहे हैं
और मदहोश होकर
सत्ता की भाषा बोल रहे हैं।

Thursday, October 10, 2019

राम ही छाँव - राम ही धूप

पता नहीं क्यों? हमारे मन में,
कुछ जीवंत प्रश्न और तर्क है।
कि हमारे और तुम्हारे राम में,
क्यों इतना फर्क है?

हमारे राम का नहीं कोई रूप है,
वही छाँव है तो वही धूप है।
हमारा राम तो लोगों के दिलों में,
दैनिक आचरण और व्यवहार में है।
पर तुम्हारा राम क्यों,
सिर्फ अयोध्या के दरबार में है?

हमारा राम सार्वकालिक,
सर्वव्यापी और जीवंत है।
अपनी मर्यादा में रहते हुए,
अपरिमित और स्वच्छंद है।
पर तुम्हारा राम!
सिर्फ मूर्तियों तक सीमित
और मंदिरों में बन्द है।

हमारा राम पहाड़ों में, जंगल में, झरनों में
नदियों की निर्मल धारा में सदा आबाद है।
वही महताब और वही आफताब है।
पर तुम क्यों साबित करने पर तुले हो कि
तुम्हारे राम की सीमा मानो एक तालाब है।

हमारा राम सदियों से, हर रोज,
रावण से युद्ध करता है।
लेकिन तुम्हारा राम साल में एक बार,
हाँ!  बस एक बार ही,
रावण के पुतले जलाकर,
मानो अपने आपको शुद्ध करता है।
और मनाता है जोरों से जश्न।
इसलिए खड़े होते हैं हमारे ऐसे प्रश्न।

हम नींव के पत्थर हैं

लगता है फिर आ गया पत्थर-युग।
चारों तरफ पत्थर ही पत्थर।
सब फेंक रहे हैं एक दूसरे पर।
कोई कीचड़  में तो कोई किसी के ऊपर।
लेकिन हम नींव के पत्थर हैं,
हमें हिलाओगे, तो खुद हिल जाओगे,
यही सदियों की असलियत है।
पत्थर सिर्फ प्रतीक नहीं, इक हकीकत है।।

कोई तराशकर इसे मूर्ति बनाता है,
तो कोई विरोधियों पर स्फूर्ति से चलाता है।
हम भूले नहीं हैं कश्मीरी पत्थरबाज को,
और नहीं भूले हैं, पत्थर पर बैठे
बुद्ध, महावीर की आवाज को,
जो हमारे समाज की आज भी वसीयत है।
पत्थर सिर्फ प्रतीक नहीं, हकीकत है।।

कोई जीता है पत्थर तोड़ के
कोई खुश है पत्थर से किसी का सर फोड़ के
कोई पत्थर सा कानून बनाता है
तो कोई उसे पथरीले तर्कों में छुपाता है
जनता की भलाई के लिए सरकार की
दिखती कहाँ, कोई नीयत है?
पत्धर सिर्फ प्रतीक नहीं, हकीकत है।।

मीडिया की भाषा भी पथरीली है।
सियासत की भाषा जहरीली है।
सारा खेल यारों सत्ता की गद्दी का है।
ना ही अन्दर का ना ही देश की चौहद्दी का है।
आजादी से अबतक यही लगता है कि
पत्थर सी हो गयी अपनी सियासत है।
पत्थर सिर्फ प्रतीक नहीं, हकीकत है। 

सवाल

हाँ! मैं सवाल हूँ।
सवाल के रूप में मैं
कल भी था, आज भी हूँ
और आगे भी रहूँगा।
यह व्यवस्था जबतक अधूरी है,
सवाल का होना बहुत जरूरी है।

सभ्यता है, संस्कृति है,
अपनी रीति और नीति है।
मान है, अपमान है,
धर्म है, विज्ञान है।
फिर कैसे किसी की रातें अंधेरी तो
किसी की सिंदूरी है?
इसलिए सवाल का होना बहुत जरूरी है।

हाँ! मैं  सवाल हूँ पर
निजी नहीं हैं मेरे सवाल।
मुझे तोड़ना है आमलोगों के
मन से भय का भ्रम-जाल।
तुम प्रताड़ित करो या दोे सजा
पर सवाल फिर भी खड़ा होगा कि
क्यों आमजनों पर आफत ही आफत
और तेरे हाथों में अंगूरी है?
इसलिए सवाल का होना बहुत जरूरी है।
सवाल का होना बहुत जरूरी है।। 

Friday, August 16, 2019

भाषा अब छोड़ो सुल्तानी

रख जीवन में सदा रवानी
मगर नहीं करना मनमानी

सबके सँग जीना ही जीना
जहर गमों का हँसकर पीना
आपस में हम रहते कैसे
छोड़ चलें वह प्रेम निशानी
रख जीवन में -------

कौन बड़ा या कौन है छोटा
नहीं समझना किसी को खोटा
सबको मान बराबर दे कर
गढ़ो प्रीत की नयी कहानी
रख जीवन में -------

नफरत किससे प्यार करोगे?
रिश्तों का व्यापार करोगे?
जहाँ मुहब्बत वहीं जिन्दगी
बिना प्रेम जीते अज्ञानी
रख जीवन में -------

करो सामना, मत डर भागो
लोग जगेंगे, तुम तो जागो
जीत प्यार की सुमन सदा है
भाषा अब छोड़ो सुल्तानी
रख जीवन में -------

कलम सुमन ने थाम लिया

हम  सबके  जीवन का यारों, 
परिवर्तन     से     नाता    है। 
कल तो आता कभी नहीं पर, 
आज  कभी  क्या जाता है??

बीते कल से सीख सीखकर, 
खुद   को   सभी   बढ़ाते  हैं। 
फिर दूजे  को  उसी सीख से, 
लोग    गलत    ठहराते   हैं।

जो हम  करते, वही  सही है,
तर्क   हमेशा   गढ़ना   क्यों?
दिखा  रहे पूर्वज की गलती,
दोष उन्हीं  पर मढ़ना क्यों??

कबतक आमजनों को प्यारे, 
या   खुद   को   भरमाओगे? 
आमलोग जाने  हैं सब कुछ,
कल   सचमुच  पछताओगे।

अलख जगाते कलमकार ही,
इसीलिए   यह  काम  लिया। 
बेहतर से बेहतर समाज हित, 
कलम  सुमन  ने थाम लिया।

Sunday, June 9, 2019

समस्या

कौन किसकी सुनता, किसे सुनाऊँ?
अपनी समस्या लेकर कहाँ कहाँ जाऊँ?

थाना गया, ब्लाक गया, सबका वही हाल है।
जिला प्रशासन की हालत तो और बदहाल है।
मंत्री के पास जाने का आता जब खयाल है।
जानते सभी उनके भी चारों तरफ घूमे दलाल है।

और आगे जाने के लिए पैसा कहाँ से लाऊँ?
अपनी समस्या लेकर कहाँ कहाँ जाऊँ?

दिल्ली के शासन पर आस्था गहरी है।
पर सभी कहते कि सत्ता सालों से बहरी है।
कोर्ट का खयाल आया, वहाँ और धंधा है।
शुरू से यही सुना सुमन कि कानून अंधा है।

जी करता लोगों को घर घर समझाऊँ।
अपनी समस्या को ऐसे सुलझाऊँ।

Monday, April 29, 2019

वंशज

आज से बेहतर हो कल
और बेहतर हो अपना
ये समरस समाज।

इस कामना के साथ,
हर सत्ता के सामने,
घुटने टेके बिना
हमें पूछने होंगे सवाल,
क्योंकि जिन्दा कौम
नहीं रहतीं खामोश।

किसे प्यार होता है,
फाँसी के फंदे से?
हमें भी नहीं है लेकिन
हम उसे चूमना जानते हैं।
क्योंकि हम भगत, अशफाक,
बिस्मिल के वंशज हैं,
इस बात को बखूबी
दिल से मानते हैं। 

Saturday, December 1, 2018

जनता ठगी की ठगी है

सभी राजनीतिक पार्टियों में
एक दूसरे को गरियाने की होड़ लगी है।
भक्तजन तालियाँ बजाकर खुश हैं
और जनता ठगी की ठगी है।

वायदे, आश्वासन, प्रलोभन में फँसकर,
हमने जब जब जिसे जिताया है।
इतिहास साक्षी है कि उसी ने शासक बनकर,
आमलोगों को लूटा और सताया है।

किस्मत की बात मानकर,
बहुतेरे शांत हैं, ऐसा दिखता है।
परन्तु यह भी उतना ही सच है कि
इन्सान अपनी किस्मत अपने ही लिखता है।

तो फिर देर क्यों साथियों? जागो!
पहचानो अपनी ताकत को।
सालोंसाल की गन्दगी हटाकर,
स्वच्छ करो सियासत को।

जहाँ संविधान हो, आजादी हो,
नहीं किसी का डर हो।
बराबरी के साथ सभी सुमन को,
खिलने का नित नया अवसर हो। 

Thursday, September 27, 2018

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि

प्रायः हम सभी,
मौत से डरते हैं और
यह भी सच है कि
एक ना एकदिन मरते हैं।

गीता कहती है, आत्मा को,
ना तो शस्त्र काट सकता, ना हवा सुखा सकती है,
ना पानी गला सकता, ना ही आग जला सकती है।
यानि आत्मा अमर है
फिर मौत से किस बात का डर है?
सिर्फ शरीर ही तो मरता है और
आत्मा हमेशा जिन्दा रहती है।

बावजूद इसके,
मानवता मौत से डरी हुई है।
लोग शरीर से तो जिन्दा दिखते है,
लेकिन बहुतों की आत्मा मरी हुई है।। 

Wednesday, September 26, 2018

उड़ान

जिन्दगी है तो सपने भी हैं
और सपनों में उड़ान भी।
उड़ान चिड़ियों की तरह,
या फिर बैलून की तरह?

चिड़ियाँ कोशिश करतीं हैं
अपने पंखों और
हौसले से उड़ान भरतीं हैं।
बीच बीच में रुककर,
खुले आकाश में अपनी
मर्जी से उड़तीं हैं।

लेकिन बैलून!
उसकी अपनी कोई मर्जी नहीं।
उसमें हाइड्रोजन भरकर,
एक बार, हाँ! बस एक ही बार,
 उड़ने के लिए
विवश किया जाता है
और बैलून आकाश में,
खास ऊचाई पर फट जाता है।

अब हमें तय करना है
अपनी अपनी जिन्दगी में कि
हम चिड़ियों की तरह
उड़ान भरें
या बैलून की तरह? 

Thursday, September 20, 2018

तू सचमुच एक हिदायत हो

मैंने  कब चाहा  है तुझको,
क्यों साथ हमेशा रहती हो।
मैं  जितना  दूर गया तुझसे,
तू  पीछे - पीछे  चलती हो।।

          ना  रूप - रंग   है  पास   मेरे,
          फिर भी मुझ पे तू मरती क्यों।
          क्या मिलता है मुझसे, तुझको,
          तू  प्यार  हमेशा  करती  क्यों।।

तुमसे  मैं  लड़ना  भी चाहा,
पर लड़ते - लड़ते हार गया।
है नाव वही, माझी भी वही,
भवसागर  में पतवार गया।।

          जीवन  भर  साथ मिला तेरा,
          अब तू जीवन की आदत हो।
          मैं   मनमानी   कर  ना  पाऊँ,
          तू सचमुच  एक  हिदायत हो।।

मैं फक्र से कहता हूँ सबको,
तुझसे  ही  चमन सुमन मेरा।
अब हाथ जोड़कर खड़ा प्रिये,
ऐ  विपदा!  तुझे  नमन मेरा।।

Sunday, May 20, 2018

अजब सी ये दुनिया अपने में मस्त है

होता उदय कहीं पे और कहीं अस्त है।
अजब सी ये दुनिया अपने में मस्त है।।

कोई आता है तो कोई जाता है 
क्या पता कौन, किसको भाता है
पर हर किसी का हर किसी से, 
कुछ न कुछ तो नाता है।
सब एक दूसरे को समझाता है, 
पर कुछ उसमें ऐसे जो सबको भरमाता है। 
मुस्कान भरे चेहरे भी भीतर से त्रस्त है।
अजब सी ये दुनिया अपने में मस्त है।। 

किसी का निशाना है किसी की निशानी है,
जीवन सबका अपने आप में इक कहानी है, 
किसी का बुढ़ापा तो किसी की जवानी है,
आँखों में समन्दर है पर वहाँ कहाँ पानी है? 
कोई खुश दिखता तो कोई दिखे पस्त है।
अजब सी ये दुनिया अपने में मस्त है।। 

बाहर बुराई है, मुझमें अच्छाई है, 
सोच तू भले ऐसा उल्टी सच्चाई है, 
दूजे की भलाई कर, अपनी भलाई है, 
बोली तो प्रीत की फिर क्यूँ लड़ाई है?
एक हाथ नीम लिए दूजे मिठाई है, 
पागल सुमन यही सोचने में व्यस्त है। 
अजब सी ये दुनिया अपने में मस्त है।।
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