Sunday, December 4, 2011

हाथ मिलाते दिखलाना है

जीवन का पथ अनजाना है
फिर लगता क्यूँ पहचाना है

समझदार खुद को सब कहते
समझे को क्या समझाना है

काश अगर बचपन आ जाए
एक बार फिर तुतलाना है

क्यों रकीब अपने बन जाते
घर घर का ये अफ़साना है

मेल दिलों का कौन देखता
हाथ मिलाते दिखलाना है

कितनी दीवारें आँगन में
सोचो कैसे तुड़वाना है

सोच बिना जो कदम बढ़ाते
आगे निश्चित पछताना है

सुख दुःख तो आते जीवन में
कोशिश हर पल मुस्काना है


घटते रिश्तों की गरमाहट
सुमन प्रीत नित सिखलाना है

13 comments:

वन्दना said...

कितनी दीवारें आँगन में
सोचो कैसे तुडवाना है

सुख दुःख तो आते जीवन में
कोशिश हर पल मुस्काना ह………………हमेशा की तरह शानदार जीवन दर्शन कराती गज़ल्।

Kailash C Sharma said...

क्यों रकीब अपने बन जाते
घर घर का ये अफ़साना है

मेल दिलों का कौन देखता
हाथ मिलाते दिखलाना है

...बहुत सुंदर और सटीक प्रस्तुति...

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

क्यों रकीब अपने बन जाते
घर घर का ये अफ़साना है

मेल दिलों का कौन देखता
हाथ मिलाते दिखलाना है

घटती रिश्तों की गरमाहट
सुमन प्रीत नित सिखलाना है

बहुत दिनों बाद आपकी रचना पढने को मिली ... बहुत खूबसूरत सोच के साथ सुन्दर रचना

anju(anu) choudhary said...

समझदार खुद को सब कहते
समझे को क्या समझाना है

क्यों रकीब अपने बन जाते
घर घर का ये अफ़साना है

katu saty.....aaj har ghar kii ye hi kahani hai ......aabhar

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

कितनी दीवारें आँगन में
सोचो कैसे तुडवाना है

सुख दुःख तो आते जीवन में
कोशिश हर पल मुस्काना है

सुन्दर ग़ज़ल सर...
सादर...

प्रवीण पाण्डेय said...

कितनी सुन्दर गजल लिखी है,
हमको यह बतलाना है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! अधिक से अधिक पाठक आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो
चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत सुन्दर प्रविष्टि...वाह!

kshama said...

कितनी दीवारें आँगन में
सोचो कैसे तुड़वाना है

सोच बिना जो कदम बढ़ाते
आगे निश्चित पछताना है
Waise to pooree rachana kamaal kee hai,lekin ye panktiyan to gazab kee hain!

गुड्डोदादी said...

श्यामल
आशीर्वाद

कितनी दीवारें आँगन में
सोचो कैसे तुडवाना है

सुख दुःख तो आते जीवन में
कोशिश हर पल मुस्काना है
क्या लिख्हूँ
कोरवों पांडवो के समय की दीवारें भी टूटी
यह झगडा पुराना है

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

आदरणीय श्यामल सुमन जी
नमस्कार !

सुख दुःख तो आते जीवन में
कोशिश हर पल मुस्काना है

वाह ! जीवन का पूरा दर्शन ही समझा दिया आपने … साधुवाद !

सुंदर रचना के लिए बधाई !


मंगलकामनाओं सहित…

- राजेन्द्र स्वर्णकार

sushma 'आहुति' said...

कोमल भावो की बेहतरीन अभिवयक्ति.....

***Punam*** said...

समझदार खुद को सब कहते
समझे को क्या समझाना है

काश अगर बचपन आ जाए
एक बार फिर तुतलाना है

bas itna hi kafi hai....
sundar..bahut sundar..!!

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