सत्ता में आए जहाँ, जब जब देर, सबेर।
वहाँ वहाँ दिखने लगी, क्यों लाशों की ढेर??
हाल हुआ बेहाल क्यों, दिखते सभी हताश।
नदियों में बिखरी पड़ी, जगह जगह क्यों लाश??
अब जिन्दा जो देश में, जीवन लगता भार।
बने लाश ना भूख से, इस पर करें विचार।।
पूछे लोग सवाल तो, करते मर्दन मान।
चिन्तन जिसके हैं मरे, वो हैं लाश समान।।
क्या गलती है आपकी, सोचें तो इक बार!
लगे नहीं फिर से कहीं, लाशों का अम्बार।।
जन की रक्षा के लिए, हम चुनते सरकार।
दिखे नहीं यूँ लाश फिर, हो जीवन से प्यार।।
दर्पण दिखलाता सुमन, हर शासक को रोज।
क्या लाशों का आंकड़ा, करिए सच्ची खोज।।

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