Tuesday, August 23, 2022

वही डराते लोग को

करता आज शिकार तू, लेकर जो हथियार।
कल शायद तू भी बने, उसका एक शिकार।। 

वही डराते लोग को, जो खुद में भयभीत।
इस कारण दुश्मन बने, कल तक जो थे मीत।।

शासन से पूछे अगर, कोई उचित सवाल।
तब शासक का देखिए, रूप गजब विकराल।।

आमजनों को लूटना, यही सियासी खेल।
मत भूलें शासक कभी, जनता हाथ नकेल।।

साँप, नेेवले अब चढ़े, जा कर एक मचान।
राजनीति में नित नया, मुमकिन है तूफान।।

सभी दलों पर देखिए, लगे हुए हैं दाग।
सुलग रही अब लोग में, परिवर्तन की आग।।

लोक जागरण के लिए, लिखे सुमन कुछ रोज।
जीवन जीने के लिए, नित्य जरूरी खोज।।

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